नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 31-32-33-34-35

ख़ुत्बा-31 [ जब जंगे जमल शुरुउ होने से पहले हज़रत ने इब्ने अब्बास को ज़ुबैर के पास इस मक़सद (उद्देश्य) से भेजा कि वह उन्हें इताअत (आज्ञा पाल...

ख़ुत्बा-31

[ जब जंगे जमल शुरुउ होने से पहले हज़रत ने इब्ने अब्बास को ज़ुबैर के पास इस मक़सद (उद्देश्य) से भेजा कि वह उन्हें इताअत (आज्ञा पालन) की तरफ़ पलटांए, तो उस मौक़े पर उन से फ़रमाया ]

'' तल्हा से मुलाक़ात न करना। अगर तुम उस से मिले तो तो तुम उस को ऐसा सरकश बैल पाओगे जिस के सींग कानों की तरफ़ मुड़े हुए हों। वह मुंह ज़ोर सवारी पर सवार होता है और फिर कहता यह है कि यह राम की हुई सवारी है। बल्कि तुम ज़ुबार से मिलना, इस लिये कि वह नर्म तबीअत है और उस से यह कहना कि तुम्हारे मामूंज़ाद भाई ने कहा है कि तुम हिजाज़ में तो मुझ से जान पहचान रखते थे और यहां इराक़ में आकर बिलकुल अजनबी बन गए। आखिर इस तब्दीली का क्या सबब हैय़।'''

अल्लामा रज़ी फ़रमाते हैं कि इस कलाम का आखिरी जुम्ला, '' फ़मा अदा मिम्मा बदा '' जिस का मतलब यह है कि इस तब्दीली का क्या सबब हुआ सब से पहले आप ही की ज़बान से सुना गया है।

खु़त्बा-32

ऐ लोगों ! हम एक ऐसे कज रफ़्तार ज़माने (टेढ़ी चाल वाले युग) और नाशुक्र गुज़ार (कृतध्र) दुनिया में पैदा हुए हैं कि जिस में नेकू कार (सदाचारी) को खताकार (अपराधी) समझा जाता है और ज़ालिम (अत्याचारी) अपनी सरकशी (अवज्ञा) में बढ़ता ही जाता है। जिन चीज़ों को हम जानते हैं, उन से फ़ाइदा (लाभ) नहीं उठाते, और जिन चीज़ों को नहीं जानते, उन्हें दर्याफ़्त (पूछताछ) नहीं करते और जब तक मुसीबत आ नहीं जाती, हम ख़तरा महसूस नहीं करते। (इस ज़माने के) लोग चार तरह के हैं, (1) कुछ वह हैं जिन्हें मुफ़सिदा अंगेज़ी (उपद्रव फैलाने) से माने (निरोधक) सिर्फ उन के नफ़्स (आत्मा) का बे वक़्अत (अवमूल्य) होना, उन की धार का कुन्द (कुंठ) होना, (2) कुछ लोग वह हैं, जो तलवारें सौंते हुए अलानिया शर (आतंक) फैला रहे हैं और उन्होंने अपने सवार और पियादे जम्अ कर रखे हैं, सिर्फ़ कुछ माल बटोरने या किसी दस्ते (सैनिक टुकड़ी) की क़ियादत (नेतृत्व) या मिंबर पर बलन्द (ऊँचा) होने के लिये उन्हों ने अपने नफ्सों (प्राणों) को वक़्फ (समर्पित) कर दिया है और दीन (धर्म) को तबाहो बर्बाद (नष्ट) कर डाला है। कितना ही बुरा सौदा है कि तुम दुनिया को अपने नफ़्स (आत्मा) की क़ीमत (मूल्य) और अल्लाह के यहां की नेमतों का बदल क़रार दे लो। (3) और कुछ लोग वह हैं जो आख़िरत वाले कामों से दुनिया तलबी करते हैं और यह नहीं करते कि दुनिया के कामों से भी आख़िरत का बनाना मक़सूद रखें। यह अपने ऊपर बड़ा सुकून व वक़ार (शान्ति एंव गम्भीरता) तारी (व्याप्त) रखते हैं आहिस्ता आहिस्ता क़दम उठाते हैं और दामनों को ऊपर की तरफ़ समेटते रहते हैं और अपने नफ्सों को इस तरह संबार लेते हैं कि लोग उन्हें अमीन समझ लें। यह लोग अल्लाह की पर्दापोशी से फ़ाइदा उठा कर उस का गुनाह (पाप) करते हैं, (4) और कुछ लोग वह हैं जिन्हें उन के नफ्सों (आत्माओं) की कमज़ोर (दुर्बलता) और साज़ो सामान की ना फ़राहमी मुल्क गीरी के लिये उठने नहीं देती। इन हालात ने उन्हें तरक्क़ी व बलन्दी हासिल करने से दरमान्दा व आजि़ज़ कर दिया है। इस लिये क़िनाअत के नाम से उन्हों ने अपने आप को आरास्ता कर रखा है और ज़ाहिदों के लिबास से अपने को सजा लिया है। हालांकि उन्हें इन चीज़ों से किसी वक्त कभी कोई लगाव नहीं रहा। उस के बाद थोड़े से वह लोग रह गए हैं जिन की आंखे आख़िरत की याद और हश्र के खौफ़ से झुकी हुई हैं और उन से आंसू रवां रहते हैं। उन में कुछ तो वह हैं, जो दुनिया वालों से अलग थलग तनहाई में पड़े हैं। और कुछ ख़ौफ़ो हिरास के आलम में ज़िल्लतें सह रहे हैं और बअज़ ने इस तरह चुप साध ली है कि गोया उनके मुंह बांध दिये गए हैं। कुछ ख़ुलूस से दुआएं मांग रहे हैं, कुछ ग़म ज़दा व दर्द रसीदा (दुखी) हैं जिन्हें ख़ौफ़ (भय) ने गुमनामी के गोशे में बिठा दिया है और ख़स्तगी व दरमांदगी (दरिद्रता एंव दुख) उन पर छाई हुई है। वह एक शूर दरिया (खारी नदी) में हैं (कि बावजूद पानी की कसरत के फिर भी वह प्यासे हैं) उन के मुंह बन्द और दिल मजरुह (घायल) हैं। उन्हों ने लोगों को इतना समझाया, बुझाया कि वह उक्ता गए और इतना उन पर जब्र किया गया, कि वह बिलकुल दब गए, और इतने क़त्ल किये गए कि उन में (नुमायां) कमी हो गई। इस दुनिया को तुम्हारी नज़रों में कीकर (बबूल) के छिलकों और उन के रेज़ों से भी ज़ियादा हक़ीरो पस्त (तुच्छ व दलित) होना चाहिये और अपने क़ब्ल (पूर्व) के लोगों से तुम इबरत (शिक्षा) हासिल (प्राप्त) कर लो इस से क़ब्ल (पहले) कि तुमहारे हालात से बाद वाले इबरत हासिल करें और इस दुनिया की बुराई महसूस करते हुए इस से क़त्ए तअल्लुक़ (सम्बंध विच्छेद) कर लिया जो तुम से ज़ियादा उस के वालेहो शैदा (चाहने वाले) थे।

सैयद रज़ी फ़रमाते हैं कि बअज़ लोगों ने अपनी लाइल्मी की बिनी पर इस क़ुत्बे को मुआविया की तरफ़ मन्सूब किया है हालांकि यह अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम का कलाम है जिस में किसी शको शुब्ह की गुंजाइश नहीं है। भला सोने को मिट्टी से क्या निस्बत और शीरीं (मीठे) पानी को शूर (खारी) पानी से क्या रब्त ? चुनांचे इस वादी में राह दिखाने वाले माहिरे फ़न और परखने वाले बा बसीरत अमर इब्ने बहरे जाहिज़ ने इस की खबर दी है, और अपनी किताब '' अलबयान वक्तबयीन '' में इस का ज़िक्र किया है और उन लोगों का भी ज़िक्र किया है जिन्हों ने इसे मुआविया की तरफ़ मन्सूब किया है। इस के बाद कहा है कि यह कलाम अली अलैहिस सलाम के कलाम से हू बहू मिलता जुलता है और इस में जो लोगों की तक़सीम और उन की ज़िल्लत व पस्ती और ख़ौफ़ो हिरास की हालत बयान की है, यह आप ही के मस्लक से मेल खाती है। हम ने तो किसी हालत में भी मुआविया को ज़ाहिदों के अन्दाज़ और आबिदोंके तरीक़े पर कलाम करते हुए नहीं पाया।

ख़ुत्बा-33

[ अमीरुल मोमिनीन जब बसरे से जंग के लिये निकले तो अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास कहते हैं कि मैं मक़ामे ज़ी क़ार में हज़रत की खितमत में हाज़िर हुआ तो देखा कि आप अपना जूता टांक रहे हैं। मुझे देख कर फ़रमाया कि '' ऐ इब्ने अब्बास ! इस जूते की क्या क़ीमत होगी ? मैंने कहा कि अब तो इस की कुछ भी क़ीमत न होगी। तो आप ने फ़रमाया कि, अगर मेरे पेशे नज़र हक़ का क़ियाम और बातिल का मिटाना न हो तो तुम लोगों पर हुकूमत करने से यह जूता मुजे कहीं ज़ियादा अज़ीज़ है। ''' फिर आप बाहर तशरीफ़ लाए और लोगों में यह ख़ुत्बा दिया ]

'' अल्लाह ने मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम को उस वक्त भेजा जब न अरबों में कोई किताबे (आस्मानी) का पढ़ने वाला था न कोई नुबुव्वत का दअवेदार। आप ने उन लोगों को उन के (सहीह) मक़ाम पर उतारा और नजात (निर्वाण) की मंज़िल पर पहुंचा दिया। यहां तक कि अन के सारे ख़म (टेढ़ापन) जाते रहे और हालात मोह्कम व उसतुवार (दृढ़) हो गए। ख़ुदा की क़सम! मैं भी उन लोगों में था जो उस सूरते हाल में इंक़िलाब पैदा कर रहे थे। यहां तक कि इंक़िलाब मुकम्मल हो गया। मैं ने (इस काम में) न कमज़ोरी दिखाई न बुज़दिली (कायरता) से काम लिया और अब भी मेरा इक़दाम (अग्रसरता) ऐसे ही मक़सद के लिये है। तौ सही कि मैं बातिल को चीर कर हक़ को उस के पहलू से निकाल लूं। मुझे क़ुरैश से वज्हे निज़ाअ ही और क्या है ? ख़ुदा की क़सम ! मैं ने तो उन से जंग की, जब कि वह काफ़िर थे और अब भी जंग करूंगा जब कि वह बातिल के वर्ग़लाने में आ चुके हैं और जिस शान से मैं कल उन का मद्दे मुक़ाबिल रह चुका हूं वैसा ही आज साबित हंगा।'''

ख़ुत्बा-34

[ लोगों को अहले शाम से आमादाए जंग करने के लिये फ़रमाया ]

हैफ़ (धिक्कार) है तुम पर ! मैं तो तुम्हें मलामत (निन्दा) करते करते भी उक्ता गया हूं। क्या तुम्हें आख़िरत के बदले दुनियवी ज़िन्दगी (सांसारिक जीवन) और इज़्ज़त (सम्मान) के बदले ज़िल्लत (अपमान) ही गवारा है ? जब तुम्हें दुश्मनों से लड़ने के लिये बुलाता हूं तो तुम्हारी आंखे इस तरह घूमने लग जाती हैं गोया तुम मौत के गिर्दाब (मृत्यु के भवर) मों हो और जांकनी की ग़फ़्लत और मदहोशी (चन्द्रा की अचेतना एंव प्रमाद) तुम पर तारी (व्याप्त) है। मेरी बातें जैसे तुम्हारी समझ ही में नहीं आतीं तो तुम शश्दर (चकित) रह जाते हो। मअलूम होता है जैसे तुम्हारे दिलो दिमाग़ पर दीवांगी (उन्माद) का असर (प्रभाव) है कि तुम कुछ अक़्ल (बुद्धी) से काम नहीं ले सकते। तुम हमेशा (सदैव) के लिये मुझ से अपना एतिमाद (विश्वास) खो चुके हो। न तुम कोई क़वी (शक्तीशाली) सहारा हो कि तुम पर भरोसा कर के दुश्मनों की तरफ़ (ओर) रुख़ किया जाए, और न तुम इज़्ज़त व कामरानी (सम्मान व सफलता) के वसीले (साधन) हो, कि तुम्हारी ज़रुरत (आवश्यकता) महसूस हो। तुम्हारी मिसाल (उदाहरण) तो उन ऊँटों की सी है जिन के चर्वाहे गुम हो गए हों। अगर उन्हें एक तरफ़ से समेटा जाये तो दूसरी तरफ़ से तितर बितर हो जायेंगे। खुदा की क़सम ! तुम जंग के शोले भड़काने के लिये बहुत बुरे साबित हुए हो। तुम्हारे खिलाफ़ (विरुद्ध) सब तदबीरें (उपाय) हुआ करती हैं और तुम दुश्मनों के ख़िलाफ़ (विरुद्ध) कोई तदबीर (उपाय) नहीं करते। तुम्हारे शहरोंके हुदूद (सीमायें) दिन ब दिन कम होते जा रहे हैं, मगर तुम्हे ग़स्सा (क्रोध) नहीं आता। वह तुम्हारी तरफ़ (ओर) से कभी ग़ाफ़िल (अचेत) नहीं होते, और तुम हो कि ग़फ़लत में सब कुछ भूले हुए हो। ख़ुदा की क़सम ! एक दूसरे पर टालने वाले हारा करते हैं। ख़ुदा की क़सम ! मैं तुम्हारे मुतअल्लिक़ यही गुमान (अनुमान) रखता हूं कि अगर जंग ज़ोर पकड़ ले और मौत की गर्म बाजारी हो तो तुम अली इब्ने अबी तालिब से इस तरह कट जाओगे जिस तरह (प्रकार) बदन से सर (कि दोबारा पलटना मुम्किन ही न हो) जो शख्स (व्यक्ती) कि अपने दुश्मन को इस तरह (प्रकार) अपने ऊपर क़ाबू दे दे कि वह उस की हड्डीयों से गोश्त (मांस) तक उतार डाले, और हड्डीयों को तोड़ दे और खाल को पारा पारा (टुकड़े टुकड़े) कर दे तो उस का अज्ज़ (विनय) इन्तिहा (चरम सीमा) को पहुंचा हुआ है और सीने की पसलियों में घिरा हुआ दिल कमज़ोर व नातवां (निर्बल एँव शक्तिहीन) है। अगर तुम ऐसा होना चाहते हो तो हुआ करो। लेकिन में तो ऐसा उस वक्त तक न होने दूंगा जब तक मक़ामे मशारिफ़ की (तेज़धार) तलवारें चला न लूं कि जिस से सर की हड्डीयों के परख़चे उड़ जायें और बाज़ू और क़दम (हात पैर) कट कट कर गिरने न लगें। उस के बाद जो अल्लाह चाहे, वह करे !

ऐ लोगों ! एक हक़ तो मेरा तुम पर है, और एक हक़ तुम्हारा मुझ पर है, कि मैं तुम्हारी ख़ैर ख्वाही (शुभ चिन्तन) पेशेनज़र (दृष्टिगत) रखूं और बैतुल माल से तुम्हें पूरा पूरा हिस्सा दूं और तुम्हें तअलाम (शिक्षा) दूं ताकि तुम जाहिल न रहो और इस तरह तुम्हें तहज़ीब सिखाऊं जिस पर तुम अमल करो, और सामने और पसे पुश्त (प्रत्यक्ष एंव परोक्ष) ख़ैर ख्वाही करो। जब बुलाऊं तो सदा (आवाज़) पर लब्बैक कहो, और जब कोई हुक्म (आदेश) दूं तो तुम उसकी तअमील करो।

यह जुम्ला (वाक्य) ऐसी अलाहिदगी (पृथकता) के लिये इल्तेमाल (प्रयोग) होता है कि जिस के बाद फिर मिल बैठने की कोई आस न रहे। साहिबे दुर्रए नजफ़ीया ने इस की तौज़ीह में चन्द अक़वाल (कुछ कथन) नक़्ल किये हैं :--

(1) इब्ने वरीद का क़ौल यह है कि इस के इस के मअनी यह हैं कि जिस तरह सर बदन से कट जाता है तो फिर उस का जुड़ना ना मुम्किन (असस्भव) होता है, यूं ही (उसी प्रकार) तुम एक दफ़्आ (बार) साथ छोड़ने के बाद फिर मुझ से न मिल सकोगे।

(2) मुफ़ज़्ज़ल का क़ौल है कि रास (सर) एक शख्स (व्यक्ति) का नाम था और शाम का एक गांव बैतुर्रास उसी के नाम पर है, यह शख्स अपना घर बार छोड़कर कहीं और चला गया, और फिर पलट कर अपने गांव में न आया, जिस से यह कहावत चल निकली, कि तुम तो यूं गए जिस तरह रास गया था।

(3) एक मअनी यह हैं कि जिस तरह सर की हड्डियों के जोड़ अलग अलग हो जायें तो फिर आपस में जुड़ा नहीं करते, यूं ही तुम मुझ से कट कर जुड़ न सकोगे।

(4) यह भी कहा गया है कि जुमला “ इन फ़रजतुम अन्नी रासा ” (यअनी तुम पूरे तौर पर मुझ से जुदा हो जाओगे) के मअनी में है। शारेह मोतज़िली ने यह मअनी क़ुतुबुद्दीने रावन्दी की शर्ह से नक़्ल करने के बाद तहरीर किया है कि यह मअनी दुरुस्त नहीं हैं क्योंकि रास जब कुल्लीयतन के मअनी में आता है तो उस पर अलिफ़ लाम दाखिल नहीं हुआ करता।

(5) इसके मअनी इस तरह भी किये जाते हैं कि तुम मुझ से इस तरह दामन छुड़ा कर चलते बनोगे, जिस तरह कोई सर बचा कर भाग खड़ा होता है। इस के अलावा एक आध मअनी और कहे गए हैं। मगर बईद होने की वजह से उन्हें नज़र अन्दाज़ किया जाता है।

(6) सब से पहले इस का इस्तेमाल (प्रयोग) हकीमे अरब (अरब दार्शनिक) अक़्सम इब्ने सैफ़ी ने अपने बच्चों को इत्तिहादो इत्तिफ़ाक़ की तअलीम (संगठन एंव एकता की शिक्षा) देते हुए किया। चुनांचे उस का क़ौल है कि :--

‍बेटो! सख्ती के वक़्त एक दूसरे से अलग न हो जाना, वरना फिर कभी एक जगह जमा न हो सकोगे।

ख़ुत्बा-35

[ तह्कीम के बाद फ़रमाया ]

(हर हाल में) अल्लाह के लिये हम्दो सना है। गो (यद्दपि) ज़माना (समय) हमारे लिये जांकाह मुसीबतें (जान लेवा आपत्तियां) और सब्र आज़मा हादिसे (सहनशीलता की परीक्षक घटनायें) ले आया है, मैं गवाही देता हूं कि उस के अलावा कोई मअबूद (पूजनीय) नहीं है। वह यकता व ला शरीक है। उस के साथ कोई दूसरा खुदा नहीं है और मोहम्मद (स.अ.व.आ.व.स) उस के अब्द (बन्दे) और रसूल हैं।

(तुम्हें मअलूम होना चाहिये कि) मेह्रबान (दयालु) बाख़बर (ज्ञानी) और तज्रिबाकार (अनुभवी) नासेह (उपदेशक) की मुख़ालिफ़त (विरोध) का समरा (फल) हसरत व निदामत (पश्चाताप एंव लज्जा) होता है। मैंने इस तहकीम के मुतअल्लिक़ अपना फ़रमान सुना दिया था, और अपनी क़ीमती राय (पहूमूल्य परामर्श) का निचोड़ तुम्हारे सामने रख दिया था। काश कि क़सीम का हुक्म मान लिया जाता। लेकिन तुम तो तुन्द ख़ू मुखालिफ़ीन और अहद शिकन नाफ़रमानों की तरह इन्कार पर तुल गए। यहां तक कि नासेह (उपदेशक) ख़ुद अपनी नसीहत (उपदेश) के मुतअल्लिक़ सोच में पड़ गया, और तबीअत उस चक़माक़ की तरह बुझ गई कि जिस ने शोले भड़काना बन्द कर दिया हो। मेरी और तुम्हारी हालत शाइरे बनी हवाज़िन के उस क़ौल के मुताबिक़ है :--

“मैंने मक़ामे मुनअरजुल लिवा (टीले का मोड़) पर तुम्हें अपने हुक्म से आगाह किया (गोया उस वक्त तुम ने मेरी नसीहत पर अमल न किया) लेकिन दूसरे दिन की चाश्त को मेरी मेरी नसीहत की सदाक़त देख ली।”

जब अहले इराक़ की ख़ूंरेज़ तलवारों से शामियों की हिम्मत टूट गई और लैलतुल हरीर के ताबड़ तोड़ हमलों ने उनके हौसले पस्त और वल्वले खत्म कर दिये और अमर इब्ने आस ने मुआविया को यह चाल सिझाई कि क़ुरआन को नेज़ों पर बलन्द कर के उसे हकम ठहराने का नारा लगाया जाय जिस का असर यह होगा कि कुछ लोग जंग को रुकवाना चाहेंगे और कुछ जारी रखना चाहेंगे और हम इस तरह उन में फूट डलवा कर जंग को दूसरे मौक़े के लिये मुलतवी (स्थगित) करा सकेंगे। चुनांचे क़ुरआन नेज़ों पर बलन्द किये गए। इस का नतीजा यह निकला कि चन्द सर फिरों ने शोरो ग़ौग़ा मचा कर तमाम लशकर में इनतिशार व बर्हमी पैदा कर दी। और सादा लौह मुसलमानों की सरगर्मियां फ़त्ह के क़रीब पहुंचकर धीमी पड़ गई और बे सोचे समझे पुकारने लगे कि हमें जंग पर क़ुरआन के फ़ैसले को तर्जीह देना चाहिए।

अमारुल मोमिनीन ने जब क़ुरआन को आलाए कार बनते हुये देखा तो फ़रमाया कि ऐ लोगों ! इस मक्रो फ़रेब में न आओ। यह सिर्फ़ शिकस्त की रुसियाहीयों (पराजय के कलंक) से बचने के लिये चाल चल रहे हैं। मैं इन में से एक एक की सीरत जानता हूं। न यह क़ुरआन वाले हैं और न दीनो मज़हब से इन्हें कोई लगाव है। हमारे जंग करने का मक़सद ही यह था कि यह लोग क़ुरआन को मानें और उस के अहकाम पर अमल पैरा हों। ख़ुदा के लिये इन की फरे़ब कारियों में न आओ। अज़्मो हिम्मत के वलवलों के साथ आगे बढ़ो और दम तोड़ते हुए दुश्मन को खत्म कर के दम लो। मगर बातिल का पुर फ़रेब हमला चल चुका था, लोग तुग़यान व सरकशी पर उतर आए। सअद इब्ने फ़दकी तमीमी और ज़ैद इब्ने हसीने ताई दोनों बीस हज़ार आदमियों के साथ आगे बढ़े, और अमीरुल मोमिनीन से कहा कि ऐ अली ! अगर आप ने क़ुरआन की आवाज़ पर लब्बैक न कही, तो फिर हम आप का वही हशर करेंगे जो उसमान का किया था। आप फ़ौरन जंग ख़त्म करें। हज़रत ने बहुत समझाने बुझाने की कोशिश की लेकिन शैतान क़ुरआन का जामा पेहने हुए सामने खड़ा था। उसने एक न चलने दी। और उन लोगोंने अमीरुल मोमिमीन को मजबूर कर दिया कि वह किसी को भेज कर मालिके अश्तर को मैदाने जंग से वापस लौ़टायें। हज़रत ने लाचार हो कर यज़ीद इब्ने हानी को मालिक के बुलवाने के लिये भेजा। मालिक ने जब यह हुक्म सुना तो वह चकरा से गए और कहा कि उन से कहिये कि यह मौक़ा मोर्चे से अलग होने का नहीं है, कुछ देर तवक़्क़ुफ़ फ़रमायें तो मैं नवेदे फ़त्ह ले कर हाज़िरे खिदमत होता हूं। यज़ीद इब्ने हानी ने पलट कर यह पैग़ाम दिया तो लोगों ने ग़ुल मचाया कि आप ने चुपके से उन्हें जंग पर जमे रहने के लिये कहलवा भेजा है। हज़रत ने फ़रमाया मुझे इस का मौक़ा कहा मिला है कि मैं अलाहिदगी में उसे कोई पैग़ाम देता, जो कुछ कहा है तुम्हारे सामने कहा है। लोगोंने कहा कि आप उन्हें दोबारा भेजें और अगर मालिक ने आने में ताखीर (देर) की तो तो फिर आप अपनी जान से हाथ धोलें। हज़रत ने हानी को फिर रवाना किया और कहलवा भेजा कि फ़ित्ना उठ खड़ा हुआ है, जिस हालत में हो फ़ौरन आओ। चुनांचे हानी ने मालिक से जाकर कहा कि तुम्हें फ़त्ह अज़ीम है या अमीरुल मोमिनीन की जान ! अगर उन की जान अज़ीम है तो जंग से हाथ उठाओ और उन के पास पहुंचो। मालिक फ़त्ह की कामरानियों को छोड़कर उठ खड़े हुए और हसरतो अन्दोह लिये हुए हज़रत की खिदमत में पहुंचे। वहां एक हड़बोंग मचा हुआ था। आप ने लोगों को बहुत बुरा भला कहा। मगर हालात इस तरह पलटा खा चुके थे कि उन्हें सुधारा न जा सकता था।

अब यह तय पाया कि दोनों फ़राक़ में से एक एक हकम मुन्तखब कर लिया जाए तोकि वह क़ुरआन व सुन्नत के मुताबिक़ खिलाफ़त का फ़ैसला करें। मुआविया की तरफ़ से अमर इब्ने आस क़रार पाया, और हज़रत की तरफ़ से लोगों ने अबू मूसा अशअरी का नाम पैश किया। हज़रत ने इस ग़लत इन्तिखाब को देखते हुए फ़रमाया कि अगर तुम ने तहकीम के बारे में मेरा हुक्म नहीं माना, तो इतना तो करो कि इस (अबू मूसा) को हकम ना बनाओ। यह भरोसे का आदमी नहीं है। यह अब्दुल्लाह इब्न् अब्बास हैं, यह मालिके अशतर हैं। इन में से किसी एक को मुन्तखब कर लो। मगर उन्हों ने एक न सुनी और उसी के नाम पर अड़ गए। हज़रत ने फ़रमाया कि अच्छा जो चाहो करो, और वह दिन दूर नहीं है कि तुम अपनी बेराहरवीयों पर अपने हाथ काटोगे।

हकमैन की नामज़दी के बाद जब अहद नामा लिखा जाने लगा, तो अली इब्ने अबी तालिब के साथ अमीरुल मोमिनीन लिखा गया। अमर इब्ने आस ने कहा कि इस लफ़्ज़ को मिटा दिया जाय, अगर हम उन्हें अमीरुल मोमिनीन समझते तो यह जंग ही क्यों लड़ी जाती। हज़रत ने पहले तो उसे मिटाने से इन्कार किया और जब वह किसी तरह न माने, तो उसे मिटा दिया और फ़रमाया कि यह वाक़िआ हुदैबीया के वाक़िए से बिलकुल मिलता झुलता है कि जब कुफ़्फ़ार इस पर अड़ गए थे कि पैग़म्बर के नाम के साथ रसूलुल्लाह की लफ़्ज़ मिटा दी जाय और पैग़म्बर ने उसे मिटा दिया। इस पर अमरे आस ने बिगड़ कर कहा कि क्या आप हमें कुफ़्फ़ार की तरह समझते है ? हज़रत ने फ़रमाया कि तुम्हें किस दिन ईमान वालों से लगाव रहा है और कब उन्के हम नवा रहे हो ? बहर सूरत उस क़रार दाद के बाद लोग मुन्तिशिर हो गए और उन दोनों हकमों ने आपस में सलाह व मशविरे के बाद यह तय किया कि अली इब्ने अबी तालिब और मुआविया दोनों को मअज़ूल कर के लोगों को यह इखतियार दे दिया जाए कि वह जिसे चाहें मुन्तखब कर लें। जब इस के एलान का वक्त आया, इराक़ और शाम के दरमियान दौमतुल जन्दल में इजतिमाअ हुआ और यह हकम भी मुसलमानों की क़िस्मत का फ़ैसला सुनाने के लिये पहुंच गए। अमर इब्ने आस ने चालाकी से काम लेते हुए अबू मूसा से कहा कि मैं आप पर सबक़त (पहल) करना सूए अदब (बेअदबी) समझता हूं, आप सिनो साल के लिहाज़ से मुझ से बुज़ुर्ग हैं लिहाज़ा पहले आप एलान फ़रमायें। चुनांचे अबू मूसा तानने में आ गए और झूमते हुए मजमे के सामने आ खड़े हुए और लोगों को खिताब (सम्बोधित) करते हुए कहा कि ऐ मुसलमानों ! हम ने मिल कर यह फ़ैसला किया है कि अली इब्ने अबी तालिब और मुआविया को मअज़ूल कर दिया जाए और इन्तिखाबे खिलाफ़त का हक़ मुसलमानों को दे दिया जाए, वह जिसे चाहें मुन्तखब कर लें (और यह कह कर बैठ गए) अब अमरे आस की बारी आई और उस ने कहा कि ऐ मुसलमानों ! तुम ने सुन लिया है कि अबू मूसा ने अली इब्ने अबी तालिब को मअज़ूल कर दिया है, मैं भी इस से मुत्तफ़िक़ हूं। रहा मुआविया तो इस के मअज़ूल करने का सवाल ही बेदा नहीं होता, लिहाज़ा मैं उसे इस जगह पर नस्ब करता हूं। यह कहना था कि हर तरफ़ शोर मच गया। अबू मूसा बहुत चीखे चिल्लाए कि यह धोका है, फ़रेब है और अमर इब्ने आस से कहा कि तुम ने चालबाज़ी से काम लिया है और तुम्हारी मिसाल उस कुत्ते की सी है कि जूस पर कुछ लादो, जब हांपेगा—छोड़ दो जब भी हांपेगा। अमर इब्ने आस ने कहा कि तुम्हारी मिसाल उस गधे की सी है, जिस पर किताबें लदी हुई हों। ग़रज़ अमर इब्ने आस की चालाकी काम कर गई और मुआविया के उखड़े हुए क़दम फिर से जम गए।

यह था उस तहकीम का मुखतसर सा खाका जिस की असास क़ुरआन व सुन्नत को क़रार दिया गया था। मगर क्या यह क़ुरआन व सुन्नत का फ़ैसला था ? या उन फ़रेब कारियों का नतीजा जो दुनिया वाले हमेशा अपने इक़तिदार (सत्ता) को बरक़रार रखने के लिये काम में लाया करते हैं। काश कि तारिख के इन औराक़ को मुसतक़बिल के लिये मश्अले राह बनाया जाए और क़ुरआन व सुन्नत को आड़ बना कर हुसूले इक़तिदार का ज़रीआ और दुनिया तलबी का वसीला न बनने दिया जाए।

अमीरुल मोमिनीन को जब तहकीम के इस अफ़सोस नाक नतीजे की इत्तालाअ मिली, तो आप मिंबर पर तशरीफ़ लाए और यह ख़ुत्बा इर्शाद फ़रमाया जिस के लफ़्ज़ लफ़्ज़ से आप का अन्दोह व क़ल्क़ झलक रहा था और साथ ही आप की सेहतो फ़िक्रो नज़र, असाबते राय और दूर रस बसीरत पर भी रौशनी डालता है।

यह एक मसल है जो ऐसे मौक़े पर इस्तेमाल की जाती है कि जहां नसीहत करने वाले की बात ठुकरा दी जाए और बाद में पछताया जाए। इस का वाक़िया यह है कि हीरह के फ़रमां खा जुज़ैमए अबरश ने जज़ीरे के ताजदार अमर अमर इब्ने तरब को क़त्ल कर दिया जिस के बाद उस की बेटी ज़ुबा उस जज़ीरे की हुक्मरान क़रार पाई। उस ने तख्त नशीन होते ही अपने बाप के इन्तिक़ाम लेने की यह तदबीर की कि जुज़ैमा को पैग़ाम भेजा कि मैं तन्हा उमूरे सल्तनत की अंजाम दही नहींकर सकती। अगर तुम मुझे अपने हिबालए अक्द में लेकर मेरी सर परस्ती करो तो मैं शुक्र गुज़ार हूंगी। जुज़ैमा इस पेशकश पर फूला न समाया, और हज़ार सवार लेकर जज़ीरा जाने के लिये आमादा हो गया। उस के ग़ुलाम ने उसे बहुत समझाया बुझाया कि यह धोका और फ़रेब है, इस खतरे में अपने आप को न डालिये। मगर उस की अक़्ल पर ऐसा पर्दा पड़ा हुआ था कि उस की समझ में यह बात न आती थी कि ज़ुबा ने अपनी रिफ़ाक़त के लिये अपने बाप के क़ातिल ही को क्यों मुन्तखब किया है। बहर सूरत यह चल खड़ा हुआ और जब हुदूदे जज़ीरा में पहुंचा तो गो ज़ुबा का लश्कर इसतिक़बाल के लिये मौजूद था, मगर न उस ने कोई खास आवभगत की, न पुर तपाक खैर मक़दम किया। यह देख कर क़सीर का फिर माथा ठंका, और उस ने जुज़ैमा से पलट जाने को कहा। मगर मंज़िल के क़रीब पहुंच कर आतिशे शोक़ और भड़क उठी थी। उस ने पर्वा न की और क़दम बढ़ा कर शहर के अन्दर दाखिल हो गया, वहां पहुंचते ही क़त्ल कर डाला गया। क़सीर ने जब यह देखा तो कहा काश क़सीर की बात मान ली होती। और उस वक्त से यह मसल चल निकली।

शाइरे बनी हवाज़िन से मुराद दुरैद इब्ने सम्मह है। और यह शेर उस ने अपने भाई अब्दुल्लाह इब्ने सम्मह के मरने के बाद कहा। जिसका वाक़िआ यह है कि अब्दुल्लाह अपने भाई के हमराह बनी बिक्र इब्ने हवाज़िन पर हमला आवर हुआ और उन के बहुत से ऊँट हंका लाया। वापसी पर जब मक़ामे मुन्अरजुल लिवा में सुस्ताने का इरादा किया तो दुरैद ने कहा कि यहां ठहरना मसलहत के खिलाफ़ है। ऐसा न हो कि पीछे से दुश्मन टूट पड़े। मगर अब्दुल्लाह न माना और वहां ठहर गया जिस का नतीजा यह हुआ कि सुब्ह होते ही दुश्मन ने हमला कर दिया और अब्दुल्लाह को वहीं पर क़त्ल कर दिया। दुरैद के भी ज़ख्म आये, लेकिन वह बच निकला और उसके बाद चन्द अश्आर कहे उन में से एक शेर यह है जिस में उस की राय के ठुकरा दिये जाने से जो तबाही आई थी उसकी तरफ़ इशारा किया है।

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