नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 20-21-22-23-24-25

ख़ुत्बा-20 ''जिन चीज़ों को तुम्हारे मरने वालों ने देखा है, अगर तुम भी उसे देख लेते तो घबरा जाते और सरासीमा व मुज़तरिब हो जाते और (हक...

ख़ुत्बा-20

''जिन चीज़ों को तुम्हारे मरने वालों ने देखा है, अगर तुम भी उसे देख लेते तो घबरा जाते और सरासीमा व मुज़तरिब हो जाते और (हक़ की बात) सुनते और उस पर अमल करते। लेकिन जो उन्हों ने देखा है वह अभी तुम से पोशीदा है और क़रीब है कि वह पर्दा उठा दिया जाए। अगर तुम चश्मे बीना (देखने वाली आंख) और गोशे शुन्वा (सुन्ने वाले कान) रखते हो, तो तुम्हें सुनाया और दिखाया जा चुका है और हिदायत की तलब है तो तुम्हे हिदायत की जा चुकी है। मैं सच कहता हूं कि इब्रतें तुम्हें बलन्द आवाज़ से पुकार चुकी हैं। और धम्काने वाली चीज़ों से तुम्हें धम्काया जा चुका है। आस्मानी रसूलों (फ़रिश्तों) के बाद बशर (इंसान) ही होते हैं जो तुम तक अल्लाह का पैग़ाम पहुंचाते हैं। इसी तरह मेरी ज़बान से जो हिदायत हो रही है, दर हक़ीक़त अल्लाह का पैग़ाम है जो तुम तक पहुंच रहा है।''

ख़ुत्बा-21

''तुम्हारी मन्ज़िले मक़्सूद (गंतव्य स्थान) तुम्हारे सामने है। मौत की साअत (मृत्यु का क्षण) तुम्हारे अक़ब में (पीछे) है, जो तुम्हे आगे की तरफ़ (ओर) ले चल रही है। हल्के फुल्के रहो ताकि आगे बढ़ने वालों को पा सको। तुम्हारे अगलों को पिछलों का इन्तिज़ार कराया जा रहा है (कि यह भी उन तक पहुंच जायें)।

सैयिद रज़ी फ़रमाते हैं कि कलामे खुदा व रसूल (स.) के बाद जिस कलाम से भी इन कलिमात (वाक्यों) का मुवाज़ना (तुलना) किया जाय तो हुस्त्रो खूबी (सौन्दर्य एंव श्रेष्ठता) में इन का पल्ला भारी रहेगा और हर हैसियत से बढ़े चढ़े रहेंगे और आप का यह इर्शाद (कथन) है कि, '' तखफ्फ़क़ू तल्हक़ू '' इस से बढ़ कर तो कोई जुम्ला (वाक्य) सुनने ही में नही आया जिस के अल्फ़ाज़ (शब्द) कम हों और मअनी (अर्थ) बहुत हों। अल्लाहो अक्बर ! कितने इस कलिमे के मअनी बलन्द और इस हिक्मत (दर्शन) का चश्मा (स्त्रोत) साफ़ व शफ्फ़ाफ़ (स्वच्छ) है और हम ने अपनी किताब, '' खसाइस '', में इस फ़िक्रे की अज़मत (श्रेष्ठता) और उस की मअनी (अर्थ) की बलन्दी पर रौशनी डाली है।

ख़ुत्बा-22

मअलूम (विदित) होना चाहिये कि शैतान ने अपने गुरोह को भड़काना शुरुउ (आरम्भ) कर दिया और अपनी फ़ौजें (सेनायें) फ़राहम (उपलब्ध) कर ली हैं ताकि ज़ुल्म (अत्याचारी) अपनी इन्तिहा की हद (चरम सीमा) तक बातिल (अर्धम) अपने मक़ाम (स्थान) पर पलट आए। ख़ुदा की क़सम ! उन्हों ने मुझ पर सच्चा इल्ज़ाम (आरोप) नहीं लगाया और न उन्हों ने मेरे और अपने दरमियान (बीच) इन्साफ़ बरता। वह मुझ से उस हक़ का मुतालबा करते हैं जिसे ख़ुद उन्हों ने छोड़ दिया, और उस खून का एवज़ (बदला) चाहते हैं जिसे उन्हों ने खुद बहाया है। अब अगर मैं उस में उन का शरीक (सहयोगी) था तो फिर उस में उन का भी तो हिस्सा निकलता है, और अगर वही उस के मुर्तकिब (कर्त्ता) हुए हैं मैं नहीं, तो फिर उस की सज़ा (दण्ड) भी सिर्फ़ उन्हीं को भुगतना चाहिये। जो सब से बड़ी दलील (तर्क) वह मेरे खिलाफ़ पेश करेंगे वह उन्हीं के खिलाफ़ पड़ेगी। वह उस मां का दूध पीना चाहते हैं जिस का दूध मुनक़तअ (खंडित) हो चुका है। और मरी हुई बिद्अत को फिर ज़िन्दा करना चाहते हैं। उफ़ ! कितना नामुराद (दुष्ट) यह जंग (युद्ध) के लिये पुकारने वाला है, यह है कौन लल्कारने वाला ? और किस मक़्सद (उद्देश्य) के लिये उस की बात को सुना जा रहा है ? और मैं तो इस से ख़ुश हूं कि उन पर अल्लाह की हुज्जत तमाम (पूर्ण) हो चुकी है और हर चीज़ उस के इल्म में है। अगर इन लोगों ने इताअत (आज्ञा पालन) से इन्कार किया तो मैं तलवार की बाढ़ उन के सामने रख दुंगा जो बातिल से शिफ़ा देने और हक़ की नुसरत (सहायता) के लिये काफ़ी (पर्याप्त) है। हैरत (आश्चर्य) है कि वह मुझे यह पैग़ाम (संदेश) भेजते हैं कि मैं नेज़ा ज़नी (भाला चलाने) के लिये जमने पर तैयार रहूं। रोने वालियां उन के ग़म (शोक) में रोयें, मैं तो हमेशा (सदैव) ऐसा रहा कि जंग (युद्ध) से मुझे धमकाया नहीं जा सका और शमशीर ज़नी (तल्वार चलाने) से ख़ौफ़ ज़दा (भयभीत) नहीं किया जा सका। और मैं अपने पर्वरदिगार (पालने वाले) की तरफ़ से यक़ीन (विश्वास) के दरजे पर फ़ाइज़ (श्रेणी को प्राप्त) हूं और अपने दीन (धर्म) की हक़्क़ानियत (सत्यता) में मुझे कोई शक (सन्देह) नहीं है।''

जब अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम पर क़त्ले उस्मान (उस्मान की हत्या) की तोहमत (लांछन) लगाई गई तो इस ग़लत इल्ज़ाम (आरोप) की तरदीद (रद्द) में यह ख़ुत्बा (भाषण) इर्शाद फ़रमाया जिस में इल्ज़ाम रखने वालों के मुतअल्लिक़ फ़रमाते हैं कि यह इन्तिक़ाम की रट लगाने वाले यह तो कह नहीं सकते कि तन्हा मैं ही क़ातिल (हत्यारा) हूं और इस में और कोई शरीक न था, और न यह कह कर सामने के वाक़िआत (घटनाओं) को झुटला सकते हैं कि वह खुद इस से बेतअल्लुक़ (निर्दोश) थे तो फिर इस इन्तिक़ाम (बदले) के लिये मुझे ही क्यों आगे घर लिया है ? मेरे साथ अपने को भी शरीक करें, और अगर मैं उस से बरीउज़ज़िम्मा हूं तो वह खुद अपनी बराअत (दूरी) साबित नहीं कर सकते। लिहाज़ा इस पादाश (दण्ड) से अपने को क्यों अलग कर रहे हैं।

हक़ीक़ते अम्र (वास्तविकता) सह है कि मुझे मौरिदे इल्ज़ाम (आरोपित) ठहराने से उन का मक़सद यह है कि मैं उन से वही रविश इख्तियार करूं जिस के यह आदी रह चुके हैं। लेकिन उन को मुझ से यह तवक्को (अपेक्षा) न रखनी चाहिये कि मैं साबिक़ा दौर (विगत काल) की बिद्अतों को फिर से ज़िन्दा (जीवीत) करूंगा। रहा जंग का सवाल तो मैंन उस से कभी डरा हूं और न अब खाइफ़ (भयभीत) हूं। मेरी नीयत को अल्लाह जानता है और वह यह भी जानता है कि यह इन्तिक़ाम (प्रतिशोध) का सहारा ले कर खड़े होने वाले ही उन के खून से हाथ रंगने वाले हैं। चुनांचे तारीख इस से हम नवा (हम आवाज़) है कि जिन लोगों ने इश्तिआल (उत्तेजना) दिला कर उन की मौत का सरो सामान किया था और जनाज़े (शव) पर पत्थर बरसवा कर मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़्न होने तक से माने (बाधक) हुए थे वह वही लोग थे जो उन के खून का बदला लेने के लिये उठ खड़े हुए थे। इस सिलसिले में तल्हा इब्ने उबैदुल्लाह, ज़ुबैर इब्ने अवाम, और उम्मुल मोमिनीन आइशा का नाम सरे फ़ेहरिस्त नज़र आता है। और दोनों मौक़ों पर उन की कोशिशें नुमायां हो कर सामने आती हैं। चुनांचे इब्ने अबिल हदीद लिखते हैं :--

'' जिन लोगों ने क़त्ले उस्मान के सिलसिले में वाक़िआत तहरीर किये हैं, वह बयान करते हैं कि उन के क़त्ल के दिन तल्हा की यह हालत थी कि वह लोगों की नज़रों से बचने के लिये चेहरे पर नक़ाब डाले हुए हज़रत उस्मान के घर पर तीर बारानी कर रहे थे।''

और इस सिलसिले में ज़ुबैर के खयालात के बारे में तहरीर करते हैं कि :---

'' मुवर्रिख़ीन (इतिहासकारों) ने यह भी बयान किया है कि ज़ुबैर कहते थे कि उस्मान को क़त्ल कर दो उस ने तो तुम्हारा दीन ही बदल डाला है। लोगों ने कहा कि आप का बेटा तो उन के दरवाज़े पर खड़ा उन की हिफ़ज़त कर रहा है आप ने कहा कि ख्वाह मेरा बेटा ही पहले काम आ जाए मगर उस्मान क़त्ल कर दिया जाए। यह तो कल पुले सिरात पर मुर्दार की सूरत में पड़ा होगा।

''मुग़ीरा इब्ने शअबा'' हज़रत आइशा के पास आया तो आप ने फ़रमाया ऐ अबू 'अब्दिल्लाह काश तुम जमल के मौक़े पर मेरी हालत देखते कि किस तरह तीर मेरे हौदज को चीरते हुए निकल रहे थे, यहां तक कि कुछ तो मेरे जिस्म से टकरा जाते थे। मुग़ीरा ने कहा ख़ुदा की क़सम मैं तो यह चाहता था कि उन में से एक आध तीर आप का खातिमा कर देता। आप ने कहा कि खुदा तुम्हारा भला करे यह केसी बात कह रहे हो, उस ने कहा कि यह इस लिये कि हज़रत उस्मान के खिलाफ़ जो आप ने तगो दौ की थी उस का कुछ तो कफ्फ़ारा हो जाता।'' (इक़्दुल फ़रीद 2 सफ़्हा 87)

ख़ुत्बा-23

हर शख्स (व्यक्ति) के मक़सूम (भाग्य) में जो कम या ज़ियादा होता है, उस लेकर फ़र्माने क़ज़ा (अल्लाह का निश्चित फ़ैसला) आस्मान (आकाश) से लेकर ज़मीन (पृथ्वी) पर इस तरह उतरते हैं जिस तरह बारिश (वर्षा) के क़तरात (बूंदे)। लिहाज़ा अगर कोई शख्स अपने किसी भाई के अहलो-मालो-नफ्स (परिवार जन माल व स्वयं) में फ़रावानी (अधिकता) व वुस्अत (फ़ैलाव) पाए तो यह चीज़ उस के लिये कबीदगीये (वैमनस्यता) खातिर का सबब (कारण) न बने । जब तक कोई मर्दे मुसलमान किसी ऐसी ज़लील (दुष्ट) हरकत का मुर्तकिब (कर्ता) नहीं होता कि जो ज़ाहिर (प्रकट) हो जाय, तो उस के तज़्किरे (चर्चे) से आंखें नीची करनी पड़ें और जिस से ज़लील आदमियों की जुरअत (हिम्मत) बढ़े। वह उस कामयाब (सफल) जुआरी के मानिन्द (समान) है जो जुए के तीरों का पाँसा फ़ेक कर पहले मरहले (मंज़िल) पर ही ऐसी जीत का मुतवक्के (अपेक्षित) होता है जिस से उसे फ़ाइदा हासिल हो और पहले नुक़सान (हानि) हो भी चुका हो तो वह दूर हो जाए। इसी तरह से वोह मुसलमान जो बद् दियानती से पाक दामन हो, दो अच्छाइयों में से एक का मुन्तज़िर (प्रतीक्षक) रहता है, या अल्लाह की तरफ़ से बुलावा आए तो इस शक्ल में अल्लाह के यहां की नेअमतें (अनुकम्पाएं) ही उस के लिये बेह्तर हैं और या अल्लाह तआला की तरफ़ से (दुनिया की) नेअमतें हासिल (प्राप्त) हों तो उस सूरत में उस के माल भी है और औलाद भी और फिर उस का दीन और इज़्ज़ते नफ़्स भी बरक़रार (स्थिर) है। बेशक (निस्सन्देह) माल व औलाद दुनिया की खेती और अमले सालेह (शुभ कर्म) आख़िरत की किश्तज़ार (खेती) है और बअज़ लोगों के लिये अल्लाह इन दोनों चीज़ों को यकजा (एकत्र) कर देता है। जितना अल्लाह ने डराया है उतना उस से डरते रहो और इतना उस से ख़ौफ़ खाओ कि तुम्हें उज़्र न करना पड़े। अमल (कर्म) बे रिया (बिना बनावट) करो इस लिये कि जो शख्स किसी और को लिये अमल करता है अल्लाह उस को उसी के हवाले कर देता है। हम अल्लाह से शहीदों की मन्ज़िलत, नेक़ो की हमदमी और अंबिया की रिफ़ाक़त का सवाल करते हैं।

ऐ लोगों ! कोई शख्स भी अगरचे वह मालदार हो अपने क़बीले वालों और इस अम्र से कि वह अपने होथों और अपनी ज़बानों से उस की हिमायत करें बेनियाज़ नहीं हो सकता। और वही लोग सब से ज़ियादा उस के पुश्त पनाह और उस की परीशानियों को दूर करने वाले और मुसीबत पड़ने की सूरत में उस पर शफ़ीक़ व मेह्रबान होते हैं। अल्लाह जिस शख्स का सच्चा ज़िक्रे ख़ैर लोगोंमें बरक़रार रखता है तो यह उस माल से कहीं बेह्तरहै जिस का वह दूसरों को वारिस बना जाता है।'''

[ इसी ख़ुत्बे का एक जुज़ (अंश) यह है ]

देखो तुममें से अगर कोई शख्स अपने क़रीबियों (निकट सम्बंधियों) को फ़क़्रो फ़ाक़ा में पाए तो उन की एहतियाज (मोह्ताजी) को उस इम्दाद (सहायता) से दूर तरनेमें पहलू तही (आनाकानी) न करे जिस के रोकने से यह कुछ बढ़ न जायेगा और सिर्फ़ (व्यय) करने से उस में कोई कमी न होगी, जो शख्स अपने क़बीले की इआनता (सहायता) से हाथ रोक लेता है तो उस का तो एक हाथ रुकता है, लेकिन वक्त पड़ने पर बहुत से हाथ उस की मदद से रुक जाते हैं, जो शख्स नर्म ख़ू (विनम्र प्रकृति) हो वह अपनी क़ौम की महब्बत हमेशा बाक़ी रख सकता है।

शरीफ़ रज़ी फ़रमाते हैं कि यहां पर ग़फ़ीरा के मअनी कसरत व ज़ियादती के हैं और यह अरबों के क़ौल अल जम्मुल ग़फ़ीर और अल जम्माउल ग़फ़ीर (इज़दिहाम, भीड़) से माखूज़ हैं। और बअज़ रिवायतों में ग़फ़ीरा के बयाज़ अफ़्वह है। और अफ़्वह किसी शय के उमदा और मुन्तखब (चयनित) हिस्से को कहते हैं। यूं कहा जाता है, ''अक़्ल तो अफ़्वतत तआमे'' यअनी मैंने मुन्तखब और उम्दा खाना खाया। ''व मैं यक़्बिज़ यदहो अन अशीरतेही इला तमामिल कलामे'' के मुतअल्लिक़ फ़रमाते हैं कि जिस जुमले (वाक्य) के मअनी कितने हसीनो दिलकश हैं, हज़रत की मुराद यह है कि जो शख्स अपने क़बीले से हुस्ने सुलूक (सदव्यवहार) नहीं करता तो उस ने एक ही हाथ की मुनफ़िअत (लाभ) को रोका लेकिन जब उन की इमदाद की ज़रुरत पड़ेगी और उन की हमदर्दी और इआनत के लिये लाचार व मुज़्तर होगा तो वह इनके बहुत से बढ़ने वाले हाथों और उठने वाले क़दमों की हमदर्दियों और चारासाज़ियों से महरूम हो जायेगा।

ख़ुत्बा-24

'' मुझे अपनी ज़िन्दगी की क़सम! मैं हक़ के खिलाफ़ चलने वालों और गुमराही में भटकने वालों से जंग में किसी क़िस्म की रु रिआयत और सुस्ती नहीं करुंगा। अल्लाह के बन्दो ! अल्लाह से डरो और उस के ग़ज़ब (क्रोध) से भाग कर उस के दामने रहमत में पनाह (शरण) लो। अल्लाह की दिखाई हुई राह पर चलो और उस के आइद कर्दा अहकाम को बजा लाओ (अगर ऐसा हो तो) अली तुम्हारी नजाते उखूरवी का ज़ामिन है। अगरचे दुन्यवी कामरानी (सफ़लता) तुम्हें हासिल (प्राप्त) न हो ।''

ख़ुत्बा-25

[ जब अमीरुल मोमिनीन को पय दर पय (लगातार) यह इत्तिलाआत मिलीं कि मुआविया के असहाब (मित्र) आप के मक़बूज़ा शहरों पर तसल्लुत (सत्ता) जमा रहे हैं और यमन के आमिल उबैदुल्लाह इब्ने अब्बास और सिपहसालारे लश्कर सईद इब्ने नमरान बसर इब्ने अर्तात से मग़लूब (परास्त) हो कर हज़रत के पास पलट आए तो आप अपने असहाब (मित्रों) की जिहाद (धार्मिक युद्ध) में सुस्ती और ख़िलाफ़ वर्ज़ी (अवज्ञा) से बद दिल हो कर मिंबर की तरफ़ बढ़े और फ़रमाया ]

''यह आलम (हाल) है इस कूफ़े का, जिसका बन्दो बस्त मेरे हाथ में है। (ऐ शहरे कूफ़ा) अगर तेरा यही आलम रहा कि तुझमें आंधियां चलती रहीं, तो खुदा तुझे ग़ारत करे। फिर आप ने शयर का यह शेर बतौरे तम्सील (उदाहरणार्थ) पढ़ा :--

ऐ अम्र ! तेरे अच्छे बाप की क़सम, मुझे तो इस बर्तन से थोड़ी सी चिकनाहट ही मिली है (जो बर्तन के ख़ाली होने के बाद उस में लगी रह जाती है)''

मुझे यह ख़बर दी गई है कि बसर यमन पर छा गया है। बख़ुदा मैं तो अब उन लोगों के मुतअल्लिक़ (सम्बन्ध में) यह ख़याल करने लगा हूं कि वह अन्क़रीब सल्तनत व दौलत को तुम से हथिया लेंगे, इस लिये कि वह (मर्कज़े) बातिल पर मुत्तहिद व यकजा हैं। और तुम अपने मर्कज़े (केन्द्र) हक़ से परागन्दा (तितर-बितर) व मुनतशिर। तुम अमरे हक़ (सत्यबात में) अपने इमाम के नाफ़र्मान (अवज्ञाकारी) और यह बातिल में भी अपने इमाम के मुतीइव फ़र्माबरदार (आज्ञापालक) हैं। वह अपने साथी (मुआविया) के साथ अमानतदारी के फ़र्ज़ (कर्तव्य) को पूरा करते हैं और तुम ख़ियानत करने से नहीं चूकते। वह अपने शहरों में अम्न बहार रखते हैं और तुम शोरिशें (उपद्रव) बर्पा करते हो। मैं अगर तुम में से किसी को लकड़ी के एक पियाले का भी अमीन बनाऊं, तो यह डर रहता है कि वह उस के कुण्डे को तोड़ कर ले जायेगा। ऐ अल्लाह ! वह मुझ से तंग दिल हो चुके हैं और मैं उन से। मुझे उन के बदले में अच्छे लोग अता कर और मेरे बदलेमें उन्हें कोई और बुरा हाकिम दे। खुदाया इन के दिलों को इस तरह अपने ग़ज़ब (क्रोध से) पिघला दे जिस तरह नमक पानी में घोल दिया जाता है। खुदा की क़सम ! मैं इस चीज़ को दोस्त रखता हूं कि तुम्हारे बजाय मेरे पास बनी फ़रास इब्ने ग़निम के एक ही हज़ार सवार होते। ऐसे जिन का वस्फ़ (गुण) शायर ने यह बयान किया है कि अगर तुम किसी मौक़े पर उन्हें पुकारो, तो तुम्हारे पास ऐसे सवार पहुंचे जो तेज़ रवी में गर्मियों के अब्र (बादल) के मानिन्द (समान) हैं। (इसके बाद हज़रत मिंबर से उतर आए।)

सैयिद रज़ी अलैहिर्रहमा कहते हैं कि इस शेर में लफ्ज़े '' अरमियह '' रम्मी की जम्अ है, जिस के मअनी अब्र के हैं और ''हमीम'' के मअनी यहां पर मौसिमे गर्मा के हैं और शायर ने गर्मियों के अब्र की तख्सीस इस लिये की है कि वह सरीउस्सैर और तेज़ रफ़तार होता है। उस कि वजह यह है कि वह पानी से खाली होता है और अब्र सुस्तगाम उस वक्त होता है जब उस में पानी भरा हुआ हो और ऐसे अब्र मुल्के अरब में उमूमन सर्दियों में उठते हैं। इस शेर से शायर का मक़्सूद (अभिप्राय) यह है कि उन्हें जब मदद के लिये पुकारा जाता है और उनसे फ़र्याद रसी की जाती है तो वह तेज़ी से बढ़ते हैं और इस की दलील शेर का पहला मिसरा है '' अगर तुम पुकारो तो वह तुम्हारे पास पहुंच जायेंगे ।'''

जब तह्कीम के बाद मुआविया के क़दम मज़बूती से जम गए तो उस से अपना दाइरए सल्तनत वसीइ करने के लिये अमीरुल मोमिनीन के मक़्बू़जा शहरों पर क़ब्ज़ा जमाने के तदबीरें शुरुउ कर दीं और मुख्तलिफ़ इलाक़ों में अपनी फ़ौजें भेज दीं ताकि वह जब्रो तशद्दुद से अमीरे शाम के लिये बैअत हासिल करें। चुनांचे इस सिलसिले में बसर इब्ने अर्तात को हिजाज़ रवाना किया, जिसने हिजाज़ से लेकर यमन तक हज़ारों बे गुनाहों के खून बहाए। क़बीलों के क़बीले ज़िन्दा आग में जला दिये और छोटे छोटे बच्चों तक को क़त्ल किया। यहां तक के उबैदुल्लाह इब्ने अब्बास वालिये यमन के दो कमसिन बच्चों क़ुस्म और अब्दुर्रहमान को उन की मां हौरिया बिन्ते खालिद के सामने ज़ब्ह कर दिया।

अमीरुल मोमिनीन को जब इन सफ्फ़ाकियों और खूं रेज़ियों का इल्म हुआ तो आप ने उस की सरकोबी के लिये लश्कर रवाना करना चाहा। मगर पयहम जंग आज़माइयों की वजह से लोग जंग से जी छोड़े बैठे थे और सरगर्मी के बजाय बद दिली उन में पैदा हो चुकी थी। हज़रत ने जब उन को पहलू बचाते देखा तो यह खुत्बा इर्शाद फ़रमाया जिस में उन्हें हमीयतो ग़ैरत दिलाई है और दुश्मन की बातिल नवाज़ियों और उन के मुक़ाबिले में उन की कोताहियों का तज़्किरा कर के उन्हें जिहाद पर उभारा है। आखिर जारिया इब्ने क़िदामा ने आप की आवाज़ पर लब्बैक कही, और दो हज़ार के लश्कर के साथ उस के तआक़ुब में रवाना हुए और उस का पीछा कर के उसे अमीरुल मोमिनीन मक़्बूज़ात से निकाल बाहर किया।

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