नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 150-152

ख़ुत्बा-150 तमाम तअरीफ़ (समस्त प्रशंसा) उस अल्लाह के लिये है जो ख़ल्क़े (सृष्टि), कायनात, से अपने वुजूद (विद्यमान होने) का और पैदा शुदा मख...

ख़ुत्बा-150
तमाम तअरीफ़ (समस्त प्रशंसा) उस अल्लाह के लिये है जो ख़ल्क़े (सृष्टि), कायनात, से अपने वुजूद (विद्यमान होने) का और पैदा शुदा मख़्लूक़ (सृष्टियों) से अपने क़दीम व अज़ली (पुरात्त्व एवं आदि) होने का और उन की बाहमी शबाहत (परस्पर समान रुप)से अपने बेनज़ीर (बेजोड़ व अद्वितीय) होने के पता देने वाला है। न हवास (ज्ञानेन्द्रियां) उसे छू सकते हैं, और न पर्दे उसे छिपा सकते है, चूंकि बनाने वाले और बनने वाले, घेरने वाले और घेरने वाले और पर्वरिश (पोषण) पाने वाले में फ़र्क़ (अन्तर) होता है। वह एक है, लेकिन म इस मअनी (अर्थ) से कि उसे हरकत (गतिविधि) करना और तअब (कष्ट) उठाना पड़े। वह सुनने वाला है, लेकिन न किसी उज़्व (अंग) के ज़रीए (माध्यम) से, और देखने वाला है न इस तरह कि आंख़े फ़ैलाए। वह हाज़िर है न इस तरह कि वह छुआ जा सके। वह जुदा (पृ्थक) है, न इस तरह कि बीच में फ़ासिले की दूरी हो। वह ज़ाहिर बज़ाहिर (प्रत्यक्ष) है, मगर आंख़ों से दिखाई नहीं देता। वह ज़ातन पोशीदा (वैयक्तिक रुप से गुप्त) है, न लताफ़ते जिस्मानी की बिना पर (शारीरिक मृदुलता के आधार पर) वह सब चीज़ों से इस तरह (पृथक) है कि वह उन पर छाया हुआ है, और उन पर इक्तिदार (सत्ता) रखता है। और तमाम चीज़ें इस लिये उस से जुदा हैं कि वह उस के सामने झुकी हुई और उस की तरफ़ पलटने वाली हैं। जिस ने ज़ात के अलावा उस के लिये सिफ़ात (गुण) तज्वीज़ (प्रस्तावित) किये उस ने उस की हदबन्दी (सीमित) कर दिया है, और जिस ने उसे महदूद (सीमित) ख़याल (विचार) किया वह उसे शुमार (गणना) में आने वाली चीज़ों की क़तार (पंक्ति) में ले आया और जिस ने उसे शुमार के क़ाबिल (गणना के योग्य) समझ लिये उस ने उस की क़दामत (पुरातत्व) ही से इन्कार कर दिया, और जिस ने यह कहा कि वह कैसा है वह उस के लिये अलग से सिफ़तें ढूंढने लगा, और जिस ने यह कहा कि वह कहां है उस ने उसे किसी जगह में महदूद समझ लिया है। वह उस वक्त भी आलिम (ज्ञानी) था जब कि मअलूम (ज्ञान) का वुजूद (अस्तित्व) न था और उस वक्त भी रब (पोषक) था जब कि पर्वरिश (पोषण) पाने वाले न थे। और उस वक्त भी क़ादिर (सामर्ध्य) था जब कि ज़ेरे क़ुदतर (सामर्थाधीन) आने वाली मख़्लूक़ न थी।
इसी ख़ुत्बे का एक जुज़ (अंश) यह है।
उभरने वाला उभर आया, चमकने वाला चमक उठा, और ज़ाहिर (प्रकट) होने वाला ज़ाहिर (प्रगट) हुआ। टेढ़े मुआमले से और ज़माने (समय) को ज़माने (समय) से बदल दिया है। हम इस इन्क़िलाब (क्रान्ति) के इस तरह मुन्तज़िर (प्रतीक्षक) थे जिस तरह क़ह्त ज़दा (अकालग्रस्त) बारिश (वर्षा) के। हिलाशुब्हा (निस्सन्देह) अइम्मा अल्लाह के ठहराए हुए हाकिम हैं और उस को बन्दो से पहचनवाने वाले हैं। जन्नत में वही जायेगा जिसे उन की मअरिफ़त (परिचय) हो, और वह भी उसे पहचानें। और दोज़ख़ (नर्क) में वही डाला जायेगा जो न उन्हें पहचाने और न वह उसे पहचानें। अल्लाह ने तुम्हें इसलाम के लिये मख़्सूस (विशिष्ट) कर लिया है, और उस के लिये तुम्हें छांट लिया है, और यह इस तरह कि इस्लाम सलामती का नाम और इज्ज़ते इन्सानी का सर्माया (पूंजी) है। उस की राह को अल्लाह ने तुम्हारे लिये चुन लिया है। और उस के ख़ुले हुए अहकाम और छिपी हुई हिकमतों से उस के दलायल (तर्क) वाज़ेह (स्पष्ट) कर दिये हैं न उस के अजायबात (विचिन्नताएं) मिटने वाले हैं और न उस के तलायफ़ (मृदुलतायें) ख़त्म होने वाले हैं। इसी में नेमतों की बारिशें और तारीकियों के चराग़ हैं, और इसी के चराग़ों ((दियों) से तीरगियों) (अंधकार) का दामन चाक किया जाता है। ख़ुदा ने उस के ममनूआ मक़ामात (वर्जित स्थानों) से रोका है और उस की चरागाहों में चलने की इजाज़त दी है। शिफ़ा (स्वास्थ्य लाभ) चाहने वाले के लिये इस में शिफ़ा और बे नियाज़ी चाहने वाले के लिये इस में बे नियाज़ी है।
इस ख़ुत्बे का पहला जुज़ (अंश) अल्मे इलाहियात के अहम मतालिब पर मुशतमिल है जिस में ख़ल्क़े काइनात से क़ालिक़े काइनात (विश्व के सृष्टि कर्त्ता) के वुजूद पर इसतिदलाल फ़रमाते हुए उस की अज़लीयत व ऐनीयते सिफ़ात पर रौशनी डाली है। चुनांचे जह हम काइनात पर नज़र करते हैं तो हर हरकत के पीछे किसी मुहर्रिक का हाथ कारफ़रमा नज़र आता है जिस से एक सत्ही ज़िह्न वाला इन्सान भी यह नतीजा अख्ज़ करने पर मजबूर हो जाता है कि कोई असर मुवस्सिर के बग़ैर ज़ाहिर नहीं हो सकता। यहां तक कि चन्द दिनों का एक बच्चा भी अपने जिस्म के छू जाने से अपने शुऊर के धुंधल्कों में यह महसूस करता है कि कोई छूने वाला है, जिस का इज़हार आंखों को खोलने या मुड कर देखने से करता है तो फिर किस तरह दुनियाए काइनात की तख़्लीक़ और आलमे कौनो मकान का नज़्मो नसक़ किसी खालिक़ व मुन्तज़िम के बग़ैर माना जा सकता है।
जब एक ख़ालिक़ का एतिराफ़ ज़रूरी हुआ तो उसे मौजूद बिज़्ज़ात होना चाहिये। क्यों कि हर वह चीज़ जिस की इब्तिदा है उस के लिये एक मर्कज़े वुजूद का होना ज़रूरी है कि जिस तक वह मुन्तही हो। तो अगर वह भी किसी मूजिद का मोह्ताज होगा तो फिर उस मोजिद के लिये सवाल होगा कि वह अज़ खुद है या किसी का बनाया हुआ, और जब तक एक मौजूद बिज़्ज़ात हस्ती का इक़रार न किया जाए कि जो तमाम मुम्किनात के लिये इल्लतुल इलल हो अक़्ल इल्लतो मअलूल के नामुतनाही सिलसिलों में भटक कर सिलसिलए मौजूदात की आख़री कड़ी का तसव्वुर भी न कर सकेगी, और तसल्सुल के चक्कर में पड़ कर उसे कहीं ठहराव भी नसीब न होगा, और अगर ख़ुद उसी को अपनी ज़ात का ख़ालिक़ फ़र्ज़ किया जाए, तो दो सूरतों से खाली नहीं होगा, या तो वह मअदूम होगा या मौजूद। अगर मअदूम होगा, तो मअदूम किसी को मौजूद नहीं बना सकता, और अगर मौजूद होगा तो उसे दोबारा मौजूद करने के कोई मअनी (अर्थ) नहीं होता। लिहाज़ा उसे ऐसा मौजूद मानना पड़ेगा जो अपने वुजूद में किसी का मोह्ताज न हो और उस के मासिवा हर चीज़ उस की मोह्ताज हो, और यही एह्तियाजे काइनात उस पर चश्मए वुजूद के अज़ली और हमेशा बरक़रार होने की शाहिद है। और उस के अलावा चूंकि हर चीज़ तग़ैयुर पज़ीर है, महल व मकान की मोहताज है और अवारिज़ व सिफ़ात मों एक दूसरे के मुशाबेह् है, और मुशाबिहत कसरत की आइनादार होती है और वहदत अपनी आप ही नज़ीर है इस लिये कोई चीज़ उस की मिस्लो नज़ीर नहीं हो सकती और एक कही जाने वाली चीज़ों को भी उस की यकताई पर क़ियास नहीं किया जा सकता। क्यों कि वह हर एतिबार से वाहिद ब्र यगाना है। वह उन तमाम चीज़ों से मुबर्रह व मुनज़्ज़ह है जो जिस्मो जिस्मानियत में पाई जाती हैं। क्योंकि न वह जिस्म है न रंग है, न शक्ल है न किसी जेह्त (दिशा) में वाक़े (स्थिति) है और न किसी महल्लो मकान में महदूद है। इस लिये इन्सान अपने हवास व मशायर के ज़रीए उस का इदराको मुशाहिदा नहीं कर सकता, क्यों कि हवास उन ची़ज़ों का इदराक कर सकते हैं जो ज़मान व मकान और माद्दे की पाबन्द हों। लिहाज़ा यह अक़ीदा रख़ना कि वह देखा जा सकता है उन के लिये जिस्म मान लेना है और जब वह जिस्म ही नहीं है और न जिस्म के साथ क़ायम है और न किसी जेह्तव मकान में वाक़े है, तो उस के देखे जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। लोकिन उस की यह पोशीदगी उन लतीफ़ अजसाम की तरह नहीं है कि जिन में उन की लताफ़त की वजह से निगाहें आरपार हो जाती हैं और निगाहें उन्हें देखने से क़ासिर रह जाती हैं। जैसे फ़ज़ा की पहनाइयों में हवा। बल्कि वह ज़ाती तौर पर पोशिदा है। अलबत्ता उस के कोई शय पोशिदा नहीं है, वह देखता भी है, और सुनता भी है, लेकिन आलाते समाअत व बसारत का मोह्ताज नहीं, क्यों कि अगर वह देखने सुनने के लिये अअज़ा का नोह्ताज होगा तो उस की ज़ात अपने कमालात में ख़ारिजी चीज़ों की दस्तनिगर होगी और बहैसियत ज़ाते कामिल न रहेगी हालांकि वह हर लिहाज़ से कामिल है और उस का कोई कमाल उस की ज़ात से अलग नहीं। क्यों कि ज़ात के अलावा-अलग से सिफ़ात मानने का नतीजा यह होगा कि एक ज़ात होगी और कुछ सिफ़तें, और उस ज़ात व सिफ़ात के मजमूए का नाम होगा खुदा। और जो चीज़ अज्ज़ाए मुरक्कब हो वह अपने वुजूद में अज्ज़ा की मोह्ताज होती है और उन को मुरक्कब के तरकीब पाने से पहले मौजूद होना चाहिये। तो जब अज्ज़ा उस पर मुक़द्दम होंगे तो वह हमेशा से मौजूद और अज़ली क्यों कर हो सकता है। जब कि उस का वुजूद अज्ज़ा से मुतअख्खर है हालांकि वह उस वक्त भी इल्मो क़ुदरत व रुबूबीयत लिये हुए था जब कि कोई चीज़ मोजूद न थी। क्यों कि उस की कोई सिफ़त खारिज से उस में पैदा नहीं होती। बल्कि जो सिफ़त है वही ज़ात है, और जो ज़ात है वही सिफ़त है। इस लिये उस का इल्म इस पर मुन्हसिर नहीं हैं कि मालूम का का वुजूद हो ले तो फिर वह जाने, क्यों कि उस की ज़ात हादिस होनो वाले मअलूम से मुक़द्दम है और न उस की क़ुद्रत के लिये ज़रूरी है कि मक़दूर का वुजूद हो तो वह क़ादिर है समझा जाए, क्यों कि क़ादिर उसे कहते हैं जो तर्को फ़ेल पर यकसां इखतियार रखता हो। और यूं ही रब के मअनी मालिक के हैं और वह जिस तरह मअदूम का उस के मौजूद होने के बाद मालिक है उसी तरह मौजूद के पर्दए अदम में होने की सूरत में उसे मौजूद करने पर इखतियार रखता है। कि चाहे मअदूम रहने दे और चाहे उसे वुजूद बख़्श दे।
ख़ुत्बा-151
उसे अल्लाह की तरफ़ से मोह्लत मिली है। वह ग़फ़लत शिआरों (निश्चिंत रहने वालों) के साथ तबाहियों में गिरता है बग़ैर सीधी राह इख़तियार किये और बग़ैर किसी हादी व रहबर के साथ दिये सुब्ह सवेरे ही गुनाहगारों के साथ हो लेता है।
इसी ख़ुत्बे का एक जुज़ (अंश) यह है
आख़िरे कार (अन्ततोगत्वा) जब अल्लाह उन के गुनाहों का नतीजा (पापों का प्रतिफल) उन के सामने लायेगा, और ग़फ़लत (अचेतना) के पर्दों से उन्हें निकाल बाहार करेगा तो फिर उस चीज़ की तरफ़ बढ़ेंगे जिसे पीठ दिखाते थे, और उस शय से पीठ फिरायेंगे जिन की तरफ़ उन का रुख रेहता था। उन्हों ने अपने मत्लूबा (वांछित) सरो सामान को पाकर और ख़्वाहिशों को पूराकर के कुछ भी तो फ़ायदा हासिल न किया। मैं तुम्हें और ख़ुद अपने को इस मर्हले से मुतनब्बेह (सचेत, सकर्त) करता हूं। इन्सान को चाहिए कि वह अपने नफ़्स से फ़ायदा उठाए, इस लिये कि आंखों वाला वह है जो सुने तो ग़ोर करे, और नज़र उठाए तो हकीकतों (यथार्थों) को देख ले, और इब्रतों से फ़ाइदा उठाए। फिर वाज़ेह रास्ता (स्पष्ट मार्ग) इख़्तियार करे जिस के बाद गढ़ों में गिरने और शुब्हात (आशंकाओं) में भटक जाने से बचता रहे और हक़ से बेराह होने और बात में रद्दो बदल करने और सच्चाई में ख़ौफ़ ख़ाने से गुमराहों की मदद कर के ज़ियां कार (हानिकारक) न बने। ऐ सुनने वालों ! अपनी सरमस्तियों से होश में आओ ! ग़फ़लत से आंख़े ख़ोलो ! इस दुनिया की दोड़ धूप को कम करो, और जो बातें नबिये उम्मी सल्लल्लाहो वा आलेहे व आलेही व सल्लम की ज़बाने मुबारक के पहुंची हैं उन में अच्छी तरह फिक्र करो कि न उन से कोई चारा (उपाय) है और न कोई गुरेज़ (पलायन) की राह जो उन की मुख़ालिफ़त (विरोध) करे तुम उस से दूसरी तरफड रुख़ फ़ैर लो, और उस छोड़ो कि वह अपने नफ़्स की मर्ज़ी पर चलता रहे। फ़ख़्र (गर्व) के पास न जाओ, और बड़ाई के सर को नीचा करो, अपनी क़ब्र को याद रखो कि तुम्हारा रास्ता वही है कि जैसा करोगे वैसा पाओगे, जो बोओगे वही काटोगे, जो आज आगे भेजोगे वही कल पालोगे, आगे के लिये कुछ तहैया करो और उस दिन के लिये सरोसामान तैयार रखो। ऐ सुनने वालों ! डरो डरो ! और ऐ ग़फ़लत करने वालो ! कोशिश (प्रयास) करो, कोशिश करो। तुम्हें ख़बर रखने वाला जो बतायेगा वह दूसरा नहीं बता सकता। क़ुराने हकीम में अल्लाह के उन अटल उसूलों में से कि जिन पर वह जज़ा व सज़ा देता है और राज़ी व नाराज़ होता है यह चीज़ है कि किसी बन्दे को चाहे वह जो कुछ जतन कर डाले। दुनिया से निकल कर अल्लाह की बारगाह में जाना कोई फ़ाइदा नहीं पहूंचा सकता। जबकि वह उन ख़सलतों में से किसी एक ख़सतल से तौबा किये बग़ैर मर जाए। एक यह कि फ़राइज़े इबादत में किसी को उस का शरीर ठहराया हो, यह किसी को हलाककर के अपने ग़ज़ब (क्रोध) को ठनढ़ा किया हो, या दूसरे के किये पर ऐब लगाया हो या दीन में बिदअतें ढ़ाल कर लोगों से अपना मक़सद पूरा किया हो या लोगों से दोरुखी चाल चलता हो या दो ज़बानों से लोगों से गुफ़तुगू करता हो। इस बात को समझो इल लिये कि एक नज़ीर (मिसाल) दूसरी नज़ीर की दलील (तर्क) हुआ करती है बिला शुब्हा चौपाओं का मक़सद पेट भरना और दरिन्दों का मक़सद दूसरों पर हमला आवर होना और औरतों (स्त्रियों) का मक़सद इस पस्त दुनिया को बनाना सवारना और फित्ने अठाना ही होता है मोमिन वह है जो तकब्बुर व ग़ुरूर (अहम व धमंड) से दूर हों मोमिन वह है जो ख़ायफ़ व तरसां हों, मोमिन वह है जो हिरासां हों।
मक़सद यह है कि तमाम शर व मफ़ासिद का सर चशमा क़ुव्वते शहवीया (काम भाव) व क़ुव्वते ग़ज़बीया (क्रोध भाव) होती है। अगर इन्सान क़ुव्वते शहवीया में (काम शक्ति) से मग़लूब (त्रस्त) हो कर पेट भरना ही अपना मक़सद बनाले तो उस में और चौपाए में कोई फ़र्क़ नहीं रह जाता, क्योंकि चौपाए के पेशे नज़र भी पेट भरने का अलावा कोई मक़सद नहीं होता और अगर क़ुव्वते ग़ज़बीया (क्रोध शक्ति) से मग़लूब (त्रस्त) होकर हलाकत व तवाह कारी शुरु कर दे तो उस में और दरिन्दे में कोई फ़र्क़ न रहेगा। क्योंकि इस का मक़सद भी यही चीरना भाड़ना होता है और अगर दोनों क़ुव्वतें (शक्तियां) उस में कार फ़रमा (कार्यरत) हों तो फिर औरत के मानिन्द (समान) है। क्योंकि औरत में यह दोनों क़ुव्वतें कारफ़रमा (कार्यरत) होती हैं जिस की वजह से वह बनाओ सिंगार पर जान देती है और फित्ना व फ़साद को हवा देने में अपनी कोशिशों को बरसरे कार रखती है।
अल्बत्ता मर्दे मोमिन कभी यह गवारा न करेगा कि वह उन हेवानी ख़सलतों (मनोवृत्तियों) को अपना शिआर बनाए बल्कि वह उन क़ुव्वतों (शक्तियों) को दबाए रखता है। यूं कि न वह ग़ुरुरे ख़ुद पसन्दी को अपने पास फ़टकने देता है और न ख़ौफ़े खुदा की वजह से फित्ना न शर को हवा देता है।
इब्ने अबिल हदीद ने तहरीर किया है कि हज़रत ने यह ख़ुत्बा बस्रा की तरफ़ रवाना होते वक्त इर्शाद फ़रमाया था और बस्रे का हंगामा चूंकि एक औरत के उभारने का नतिजा था इस लिये चौपाओं दरिन्दों की तबई आदतों का ज़िक्र करने का बाद औरत को भी उन्हीं ख़सलतों का हामिल क़रार दिया है। चूंनाचे उन्हीं के नतीजे में बसरा की खूंरेज़ जंग हुए और हज़ारों अफ़राद तबाही के लपेट में आ गाए।
खुत्बा-152
अक़्लमन्द दिल की आंख़ों से अपना मआलेकार देखता है और अपनी ऊंच नीच, अच्छी बुरी राहों को पहचानता है। दअवत देने वाले ने पुकारा और निगहदाश्त (संरक्षण) करने वाले ने निगहदाश्त बुलाने वालों की आवाज़ पर लब्बैक कहो और निगहदाश्त करने वाले की पैरवी करो।
कुछ लोग फित्नों के दरियाओं में उतरे हुए हैं और सुन्नतों को छोड़ कर बिद्अतों में पड़ चुके हैं। इमान वाले दब्के पड़े हैं, और गुमराहों और झुटलाने वालों की ज़बानें ख़ुली हुई हैं। हम क़रीबी तअल्लुक़ रखने वाले और ख़ास साथी और ख़ज़ाना दार और दरवाज़े हैं, और घरों में दरवाज़ों से ही आया जाता है, और जो दरवाज़ों को छोड़ कर किसी और तरफ़ से आए उस का नाम चोर होता है।
इसी ख़त्बे का एक जुज़ (अंश) यह है।
इन्हीं के (आले मोहम्मद (स.) के बारे में क़ुर्आन की नफ़ीस आयतें उतरी हैं, और वह अल्लाह के खज़ीने हैं। अगर बोलते हैं तो सच बोलते हैं, और अगर ख़ामोश (मौन) रहते हैं तो किसी को बात में पहल का हक़ नहीं। पेशरौ को अपने क़ौम क़बीले से हर बात सच सच बयान करना चाहिए और अपनी अक़्ल को गुम ना होने दे और अहले अख़िरत में स्हे बने, इस लिये कि वह उधर ही से आया है और उधर ही उसे पलट कर जाना है। दिल की आंखों से देखने वाले और बसीरत के साथ अमल करने वाले के अमल की इबतिदा यूं होती है कि वह यह पहले यह जान लेता है कि अमल उस के लिये फ़ाइदे मन्द है या नुक़्सान रसां। अगर मुफ़ीद होता है तो आगे बढ़ता है मुज़िर होता है तो ठहर जाता है। इल लिये कि बेजाने भुजे हुए बढ़ने वाला ऐसा है जैसे कोई ग़लत रास्ते पर चल निकले तो जित्ना वह इस राह पर बढ़ता जायेगा उतना ही मक़सद से दूर होता जायेगा और इल्म की रौशनी में अमल करने वाला ऐसा है जैसे कोई रौशन राह पर चल रहा हो तो अब देखने वाले को चाहिये कि वह देखे कि आगे कि तरफ़ बढ़ रहा है या पीछे की तरफ़ पलट रहा है। तु्म्हें जानना चाहिए कि हर ज़ाहिर का वैसा ही बातिन होता है। जिस का ज़ाहिर अच्छा होता है उस का बातिन भी अच्छा होता है। और कभी ऐसा होता है जैसा रसूले सादिक़ (स.) ने फ़रमाया है कि अल्लाह एक बन्दे को ईमान की वजह से दोस्त रखता है और उस के अमल को बुरा समझता है और कहीं अमल को दोस्त रखता है और अमल करने वाले की ज़ात से नफ़रत करता है। देखो ! हर अमल एक उगने वाला सबज़ा है और सबज़े के लिये पानी का होना ज़रूरी है और पानी मुख़तलिफ़ क़िस्म (विभिन्न प्रकार) का होता है। जहां पानी अच्छा दिया जायेगा वहां पर ख़ेती भी अच्छी होगी और उस का फ़ल भी मीठा होगा। और जहां पानी बुरा दिया जायेगा वहां खेती भी बुरी होगी और फ़ल भी कड़वा होगा।
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