नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा-14-15-16-17-18

ख़ुत्बा-14 [ यह भी अहले बसरा की (निन्दा) में है ] तुम्हारी ज़मीन (समुन्दर के) पानी से क़रीब और आस्मानसे दूर है। तुम्हारी अक़लें सुबुक (बुद्द...

ख़ुत्बा-14

[ यह भी अहले बसरा की (निन्दा) में है ]

तुम्हारी ज़मीन (समुन्दर के) पानी से क़रीब और आस्मानसे दूर है। तुम्हारी अक़लें सुबुक (बुद्दियां तुच्छ) और दानाइयां खा़म (चतुराइयां कच्ची) हैं। तुम हर तीर अन्दाज़ का निशाना हर खाने वाला का लुक़मा, और शिकारी की सैद अफ़गनियों का शिकार हो ।

ख़ुत्बा-15

[ हज़रत उसमान की अता कर्दा (द्वारा प्रदान की गई) जागींरे जब पलटा दीं तो फ़रमाया ]

ख़ुदा की क़सम! अगर मुझे ऐसा माल भी कहीं नज़र आता तो औरतों के महर और कनीज़ों (दासियों) की ख़रीदारी पर सर्फ़ (व्यय) किया जा चुका होता तो उसे भी वापस पलटा लेता। चूंकी अदल (न्याय) के तक़ाज़ों (मांगों) को पूरा करने में वुसअत (विशालता) है और जिसे अदल की सूरत (न्याय की स्थिति) में तंगी महसूस हो उसे ज़ुल्म की सूरत (अत्याचार) में और ज़ियादा तंगी महसूस होगी ।

ख़ुत्बा-16

[ जब मबीने में आप की बैअत हुई तो फ़रमाया ]

में अपने क़ौल (कथन) का ज़िम्मेदार और उस की सेहत (सत्यता) का ज़ामिन हूं। जिस शख्स (व्यक्ति) को उस के दीदेए इबरत (शिक्षा ग्राहण करने वाली दृष्टि) ने गुज़श्ता उकूबतें (गत यातनायें) वाज़ेह तौर (स्पष्ट रूप) से दिखा दी हों, उसे तक़वा (अल्लाह का भय) शुब्हात (शंकाओं) में अंधाधुंद कूदने से रोक लेता है। तुम्हें जान्ना चाहिए कि तुम्हारे लिये वही इबतिलाआत (कष्ट) फिर पलट आए हैं जो रसूल (स.) की बेएसत (घोषणा) के वक्त थे । उस ज़ात की क़सम! जिस ने रसूल (स.) को हक्को सदाकत (अधिकार एंव सत्य) के साथ भेजा, तुम बुरी तरह तहो बाला (उलट-पुलट) किये जाओगे और इस तरह छांटे जाओगे जिस तरह छलनी से किसी चीज़ छाना जाता है। और इस तरह ख़लत मलत (मिश्रण) किये जाओगे जिस तरह (चमचे से हण्डिया) यहां तक कि तुम्हारे अदना (निकृष्ट) आला (श्रेष्ठ) और आला अदना हो जायंगे। ख़दा की कसम! मेंने कोई बात पर्दे में नहीं रखी, न कभी किज़ब बयानी (झूट बोलने) से काम लिया है। मुझे इस मक़ाम (स्थान) और इस दिन के पहले ही से ख़बर दी जा चुकी है। मालूम होना चाहिये कि गुनाह (पाप) उन सर्कश (अवज्ञाकारी) घोड़ों के मानिन्द (समान) हैं जिन पर उनके सवारों को सवार कर दिया गया हो और उन की बागें (लगामें) भी उतार दी गई हों और वह ले जाकर उन्हें दोज़ख (नर्क) में फ़ाद पड़े, और तक़वा (परहेज़गारी) राम की हुई सवारियों के मानिन्द (समान) हैं जिन पर उन के सवारों को सवार किया गया हो इस तरह से कि बागें उन के हाथ में दे दी गई हों और वह उन्हें (बइतमीनान) ले जा कर जत्रत (स्वर्ग) में उतार दें। एक हक़ (सत्य) होता है और एक बातिल (असत्य) और कुछ हक़ वाले होते हैं कुछ बातिल वाले। अब अगर बातिल ज़ियादा हो गया तो यह पहले भी बहुत होता रहा है और अगर हक़ कम हो गया है तो बसा औक़ात (बहुधा) ऐसा हुआ है और बहुत मुमकिन (सम्भव) है कि वह इस के बाद बातिल पर छा जाए। अगर चे काम ही होता है कि कोई चीज़ पीछे हट कर आगे बढे़ ।

अल्लामा रज़ी फ़रमाते हैं कि मुख्तसर (संक्षिप्त) से कलाम में वाक़ई खूबियों के इतने मक़ाम (स्थान) है कि एहसास खूबी का उस के तमाम गोशों (कोनों) को पा नहीं पा सकता और इस कलाम से हैरत व इसतेज़ाब का हिस्सा पसन्दीदगी की मिक़दार (मात्रा) से ज़ियादा होता है। इस हालत के बावजूद जो हम ने बयान की है, इस में फ़साहत के इतने बेशुमार पहलू हैं कि जिन के बयान करने का यारा नहीं। न कोई इनसान उस की अमीक़ गहराइयों तक पहुंच सकता है। मेरी इस बात को वही जान सकता है जिस ने इस फ़न का पूरा पूरा हक़ अदा किया हो और उस के रगो रेशे से वाक़िफ़ हो और जानने वालों के सिवा कोई इन को नहीं समझ सकता ।

[ इसी ख़ुतबे का एक हिस्सा (भाग) यह है ]

जिस के पेशे नज़र (दृष्टिगत) दोज़ख व जन्नत (नर्क एंव स्वर्ग) हो उस की नज़र किसी और तरफ़ नहीं उठ सकती। जो तेज़ क़दम (तीव्र गति से) दौड़ने वाला है वह निजात याफ़्ता (निर्वाण प्राप्त) है। मगर जो इरादतन (जान बूझकर) कोताही (शिथिलता) करने वाला हो उसे तो दोज़ख़ (नर्क) में गिरना है। दायें बायें गुमराही (भ्रष्टता) की राहें (मार्ग) हैं और दरमियानी रास्ता (मध्य मार्ग) ही सिराते मुसतक़ीम (सीधा रास्ता) है। इस रास्ते पर अल्लाह की हमेशा रहने वाली, किताब व नुबुव्वत के आसार (लक्षण) हैं। उसी से शरीअत का निफ़ाज़ (प्रभावीकरण) व इजरा (प्रचलन) हुआ। और उसी की तरफ़ (ओर) आख़िरे कार (अन्ततोगत्वा) बाज़गश्त (लौटकर जाना) है। जिस ने ग़लत इद्दिआ (दअवा) किया वह तबाहो बर्बाद हुआ और जिस ने इफ़तिरा बांधा (लांछन लगाया) वह नाकाम व नामुराद रहा। जो हक़ के मुकाबले में खड़ा होता है, तबाह हो जाता है और इनसान की जहालत (मूर्खता) इस से बढ़ कर क्या होगी कि वह अपनी क़दरो मनज़िलत न पहचाने। वह असल व आसान (मूल व आधार) जो तक़वा पर हो, बर्बाद नहीं होती, और उस के होते हुए किसी क़ौम की किश्ते अमल (कर्म की खेती) बेआब (बिना सिंचाई) व खुश्क (सूखी) नहीं रहती। तुम अपने घर के गोशों (कोनों) में छिप कर बैठ जाओ, आपस के झगड़ों की इसलाह (सुधार) करने वाला सिर्फ़ अपने पर्वरदिगार की हमद करे और भला बुरा कहने वाला अपने ही नफ़्स की मलामत (निन्दा) करे ।

बअज़ नुसखों में मन अब्दय सफ़्ह वहू लिलहक्के हल्क़ा के बाद इन्दा जहलतत्रास भी मर्क़ूम (लिखा) बै। इस बिना पर इस जुम्ले के मअनी होंगे कि जो हक़ की ख़ातिर ख़ड़ा हुआ वह जाहिलों के नज़्दीक तबाहो बर्बाद होता है।

अ़जमतो जलाले इलाही से दिलो दिमाग़ के मुतअस्सिर (प्रभावित) होने का नाम तक़्वा है, जिस के नतीजे में इन्सान की रुह (आत्मा) ख़ौफ़ व खशीयते इलाही से मअमूर (अल्लाह के भय से परिपूर्ण) हो जाती है और उस का लाज़िमी नतीजा यह निकलता है कि इबादतो रियाज़त (आराधना एंव तपस्या) में सरगर्मी (रूचि) पैदा हो जाती है। नामुम्किन है कि दिम में उस का खौफ़ (भय) बसा हो और उसका इज़हार (प्रदर्शन) इन्सान के अफ़आल व अअमाल (कृत्यों एवं कर्मों) से न हो और इबादत व नियाज़ मन्दी (आराधना एंव आज्ञापालन) से चूंकि नफ़्स की इस्लाह (प्राणवायु में सुधार) और रुह की तरबियत (आत्मा प्रशिक्षित) होती है लिहाज़ा जूं जूं (जैसे जैसे) इबादत में इज़ाफ़ा होता है नफ़्स की पाकीज़गी (पवित्रता) बढ़ती जाती है। इसी लिये क़ुरआने करीम में तक़्वा का इतलाक़ (चरितार्थ) कभी खौफ़ो खशीयत पर कभी बन्दगी और नियाज़ मन्दी (सेवा एंव आज्ञापालन) पर और कभी पाकीज़गिये क़ल्बो रुह पर हुआ करता है। चुनांचे, फ़िय्याया फ़त्तक़ून, में तक़्वा से मुराद (अभिप्राय) ख़ौफ़ (भय) है और इत्तकुल्लाह हक्का तुक़ातेह, में तक़्वा से मुराद इबादत व बन्दगी है और मैंय यख्शल्लाहा व यत्तक़हू फ़उलायका हुमुल फ़ाइज़ून, में तक़्वा से मुराद पाकीज़गीये नफ़्स और तहारते क़ल्ब है ।

अहादीस में तक़्वा के तीन दरजे क़रार दिये गए हैं। पहला दरजा यह है कि इन्सान वाजिबात की पाबन्दी और मुहर्रमात से किनारा कसी करे। दूसरा दरजा यह है कि मुस्तहब्बात की भी पाबन्दी करे और मक्रुहात से भी दामन बचाकर रहे । तीसरा दरजा यह है कि शुब्हात में मुब्तला (ग्रस्त) होने के अन्देशे (भय) से हलाल चीज़ों से भी हाथ उठा ले। पहला दरजा अवाम (सर्वसाधारण) का, दूसरा दरजा खास (विशिष्ट व्यक्तियों) और तीसरा दरजा खासुल खास का है । चुनांचे ख़ुदा वन्दे आलम ने इन तीनों दरजों की तरफ़ इस आयत में इशारा किया है :--

जिन लोगों ने ईमान क़बूल (स्वीकार) किया और अच्छे अअमाल (शुभकर्म) बजा लाए उन पर जो वह (पहले) खा पी चुके हैं उस में कुछ गुनाह नहीं, जब उन्हों ने परहेज़गारी इख्तियार कर ली है और ईमान ले आए और नेक काम किये, फ़िर परहेज़गारी की और अच्छे काम किये और अल्लाह अच्छे काम करने वालों को दोस्त रखता है ।

अमीरुल मोमिनीन फ़रमाते हैं कि उसी अमल (क्रिया) के लिये जमाव है जिस की बुनियाद (नींव) तक़्वा पर हो और वही किश्ते अमल (कर्म की खेती) फले फूलेगी जिसे तक़्वा के पानी से सींचा गया हो, क्यों कि इबादत वही है जिस में उबूदीयत (दासिता की भावना) कारफ़र्मा (कार्यरत) हो। जैसा कि अल्लाह सुब्हानहू का इर्शाद है, क्या वह शख्स (व्यक्ति) कि जिस ने अपनी इमारत (भवन) की बुनियाद (नींव)

खुदा के खौफ़ (भय) और उसकी खुशनूदी (प्रसत्रता) पर रखी है, वह बेहतर (अच्छा) है या जिस ने अपनी इमातर की बुनियाद एक गिरने वाली खाई के किनारे पर रखी कि जो उसे ले कर जहत्रम की आग में गिर पड़े।

चुनांचे हर वह एतिक़ाद (श्रद्दा) जिस की असास (आधार) इल्मो यक़ीन (ज्ञान एंव विश्वास) पर न हो, उस इमारत (भवन) के मानिन्द (समान) है जो बग़ेर बुनियाद (नींव) के खड़ी की गई हो जिस में सबात (दृढ़ता) व क़रार (स्थिरता) नहीं हो सकता और हर वह अमल (कर्म) जो बग़ैर तक़्वा के हो उस क खेती के मानिन्द (कृषि के समान) है जो आबयारी (सिंचाई) न होने की वजह (कारण) से सूख जाए।

ख़ुत्बा-17

[ उन लोगों के बारे में जो उम्मत (जनता) के फ़ैसले (निर्णय) चुकाने के लिये मस्नदे क़ज़ा (न्याय की गद्दी) पर बैठ जाते हैं हालांकि वह उस के अहल (पात्र) नहीं होते ]

तमाम लोगों में सबसे ज़ियादा (अधिक) ख़ुदा के नज़्दीक (समीप) मब्ग़ूज़ (द्वैष पात्र) दो शख्स (व्यक्ति) हैं। एक वह जिसे अल्लाह ने उस के नफ़्स (मन) के हवाले कर दिया हो (यअनी, अर्थात्) उस की बद अमालियों (दुष्कर्मों) की वज्ह से अपनी तौफ़ीक़ (सहायता) सल्ब (वापस) कर ली हो। जिस के बाद वही सीधी राह से हटा हुआ, बिद्अत (अधर्म) की बातों पर फरेफ्ता (मुग्ध) और गुमराही (पथ भ्रष्टता) की तब्लीग़ (प्रचार) पर मिटा हुआ है। वह अपने हवाख़्वाहों (शुभ चिन्तकों) के लिये फ़ित्ना (उपद्रव) और साबिक़ा (विगत) लोगों की हिदायत (पथदर्शन) से बर्गश्ता (फिरा हुआ) है। वह तमाम उन लोगों के लिये जो उस की ज़िन्दगी में या उस की मौत के बाद उस की पैरवी (अनुसरण) करे, गुमराह (भटकाने) करने वाला है। वह दूसरों के गुनाहों का बोझ उठाए हुए और ख़ुद अपनी ख़ताओं (अपराधों) में जकड़ा हुआ है। और दूसरा शख्स वह है जिस ने जहालत (अज्ञान व मूर्खता) की बातों को (इधर उधर से) बटोर लिया है। वह उम्मत के जाहिल अफ़्राद में दौड़ धूप करता है और फ़ित्नों (उपद्रवों) की तारीकियों (अंधकारों) में ग़ाफ़िल व मदहोश (निश्चेत व मदोन्मत) पड़ा रहता है और अम्नो आशती (सुख शान्ति) के फ़ाइदों (लाभों) से आंख बन्द कर लेता है। चन्द इन्सानी शक्लो सूरत से मिलते जुलते हुए लोगों ने उसे आलिम (विद्धान) का लक़ब (उपाधि) दे रखा है। हालांकि वह आलिम नहीं वह ऐसी (निरर्थक) बातों के समेटने के लिये मुंह अंधेरे निकल पड़ता है जिन का न होना होने से बेह्तर है। यहां तक कि जब इस गन्दे पानी से सेराब हो लेता है और लायअनी (निरर्थक) बातों को जम्आ कर लेता है तो लोगों में क़ाज़ी (निर्णायक) बन कर बैठ जाता है और दूसरों पर मुश्तबह रहने वाले (शंकित रहने वाले) मसाइल (समस्याओं) के हल करने का ज़िम्मा ले लेता है। अगर कोई उलझा हुआ मस्अला उस के सामने पेश होता है तो अपनी राय से उस के लिये भर्ती की फ़र्सूदा दलीलें (निरर्थक तर्क) मुहैया (उपलब्ध) कर लेता है। और फ़िर उस पर यक़ीन (विश्वास) भी कर लेता है। इस तरह वह शुब्हात के उलझाव में फंसा हुआ है जिस तरह मकड़ी ख़ुद अपने जाले के अन्दर। वह ख़ुद यह नहीं जानता कि उस ने सहीह हुक्म दिया है या ग़लत। अगर सहीह बात भी कही हो, तो उसे यह अन्देशा होता है कि कहीं ग़लत न हो अगर ग़लत जवाब हो तो उसे यह तवक्को (अपेक्षा) रहती है कि शायद यही सहीह हो। वह जहालतों में भटकने वाला जाहिल और अपनी नज़र के धुंधलापन के साथ तारीकियों में भटकने वाली सवारियों पर सवार है न उस ने हक़ीक़ते इल्म (ज्ञयान के यथार्थ) को परखा न उस की तह तक पहुंचा। वह रिवायात को इस तरह दिरहम बरमह करता है जिस तरह हवा सूखे हुए तिन्कों को। ख़ुदा की क़सम ! वह उन मसाइल (समस्याओं) के हल (निराकरण) करने का अहल (पात्र) नहीं जो उस से पूछे जाते हैं। और न उस मन्सब (पद) के क़ाबिल (योग्य) है जो उसे सिपुर्द किया गया है। जिस चीज़ को वह नहीं जानता उस चीज़ को वह कोई क़ाबिले एतिना इल्म (ध्यान देने योग्य ज्ञान) ही नहीं क़रार देता। और जहां तक वह पहुंच सकता है उस के आगे यह समझता ही नहीं कि कोई दूसरा पहुंच सकता है। और जो बात उस की समझ में नहीं आती उसे पी जाता है क्यों कि वह अपनी जहालत को ख़ुद जानता है। (नाहक़ बहाए हुए) ख़ून उस के ना रवा फ़ैसलों (ग़लत निर्णयों) की वजह से चीख़ करे हैं। और गै़र मुस्तहक़ अफ़राद को पहुंची हुई मीरासें चिल्ला रही हैं। अल्लाह ही से शिक्वा है उन लोगों का जो जहालत में जीते हैं। और गुमराही में मर जाते है। उन में क़ुरआन से ज़ियादा बेक़ीमत चीज़ नहीं जब कि उसे इस तरह पैश किया जाए जैसा पैश करने का हक़ है और उस क़ुरआन से ज़ियादा उन में कोई मक़्बूल और क़ीमती चीज़ नहीं उस वक्त जब कि उस की आयतों का बेमहल (कुसमय) इस्तेमाल (प्रयोग) किया जाए। उन के नज़दीक़ (विचार में) नेकी से ज़ियादा कोई बुराई और बुराई से ज़ियादा कोई नेकी नहीं।

अमीरुल मोमिनीन ने दो क़िस्म के लोगों को अल्लाह के नज़्दीक़ मब्ग़ूज़ (दै्धष योग्य) और बदतरीने खलाइक़ (सृष्टि में सबसे निकृष्ट) क़रार दिया है। एक वह जो सिरे से उसूले अक़ाइद (श्रद्धा के नियामों) ही में गुमराह हैं और गुमराही की नश्रो इशाअत (प्रचार कार्य) में लगे रहते है, और दूसरे वह जो क़ुरआनो सुत्रत को पसे पुश्त (पीठ के पीछे) डाल कर अपने क़ियास (अनुमान) व राय से अहकाम गढ़ लेते हैं और अपने मुक़ल्लेदीन (अनुयाइयों) का एक हल्क़ा (वर्ग) पैदा कर के उन में ख़ुद साख्ता (स्वनिर्मित) शरीअत की तरवीज (प्रचलन) करते रहते है। ऐसे लोगों की गुमराही व काज रवी सिर्फ़ उन की ज़ात तक महदूद (सीमित) नहीं रहती। बल्कि उनकी ज़लालत का बोया हुआ बीज बर्गोबार लाता है। और एक तनाव शजर (पेड़) की सूरत अख्तियार कर के गुमराहों को हमेशा अपने साये में पनाह देता रहता है और यह गुमराही बढ़ती ही रहती है। और चूँकि इस गुमराही के अस्ल बानी यही लोग होते हैं इस लिये दूसरों की गुमराही का बोझ भी उन्हीं के सर लादा जायेगा। चुंनाचे क़ुरआने करीम का इर्शाद है।

यह लोग अपने गुनाहों का बोझ तो यक़ीनन उठायेंगे और अपने बोझ के साथ (जिन्हें गुमराह किया है) उन के बोझ भी उन्हें उठाना पड़ेगा।

ख़ुत्बा-18

[ फ़तावा (फ़त्वों, निर्णयों) में उलमा के मुख्तलिफुल आरा (विभित्र मत) होने की मज़म्मत (निन्दा) में फ़रमाया ]

जब उन में से किसी एक के सामने कोई मुआमला (वाद, अभियोग) फ़ैसले (निर्णय) के लिये पेश होता है तो वह अपनी राय (विचार) से उन का हुक्म (निर्णय) लगा देता है। फिर वही मस्अला (वाद) ब ऐनेही (अक्षरश :) दूसरे के सामने पेस होता है वह उस पहले हुक्म (पूर्वादेश) के ख़िलाफ़ (विपरीत) हुक्म (आदेश) लगा देता है, फिर यह तमाम के तमाम (समस्त) क़ाज़ी के पास जम्अ (कत्र) होते है, जिस ने उन्हें क़ाज़ी बना रखा है, तो वह सब रायों (मतों) को सहीह क़रार देता है। हालेंकि (यद्दपि) उन का अल्लाह एक, नबी एक, और किताब एक है। (उन्हें ग़ौर तो करना चाहिये) क्या अल्लाह ने उन्हें इख़तिलाफ़ (मतभेद) कर के उसका हुक्म (आदेश) दिया था। और यह इख़तिलाफ़ (मतभेद) कर के उस का हुक्म बजा लाते हैं या उस ने हक़ीक़तन (वास्तव में) इख़तिलाफ़ कर के उस की नाफ़रमानी (अवज्ञा) करना चाहते हैं। या यह कि अल्लाह ने दीन को अधूरा छोड़ा था और इन के तक्मील (पूर्ण करने) के लिये हाथ बटाने का ख़्वाहिशमन्द (इच्छुक) हुआ था, या यह कि अल्लाह के शरीक (सहयोगी) थे कि उन्हें उस के अह्काम (आदेशों) में दखू़ल देने (हस्तक्षेप करने) का हक़ (अधिकार) हो,और उस पर लाज़िम (अनिवार्य) हो कि वह उस पर रज़ामन्द (सहमत) रहे, या यह कि अल्लाह ने दीन (धर्म) को तो मुकम्मल उतारा था मगर उसके रसूल (स.) ने उसके पहुंचाने और अदा करने में कोताही (उदासीनता) की थी। अल्लाह ने क़ुरआन में तो फ़रमाया है कि हम ने किताब में कोई चीज़ बयान करने में कोताही (उदासीनता) नहीं की और उस में हर चीज़ (वस्तु) का वाज़ेह बयान (स्पष्ट वर्णन) है और यह बी कहा है कि क़ुरआन के बअज़ (अमुक) हिस्से (भाग) बअज़ हिस्सों (अमुक हिस्सों) की तस्दीक़ (पुष्टि) करते हैं और उस में कोई इख़तिलाफ़ (मतभेद) नहीं। चुनांचे अल्लाह का यह इर्शाद है कि अगर यह क़ुरआन अल्लाह के अलावा (अतिरिक्त) किसी और का भेजा होता, तो तुम इस में काफ़ी इख़तिलाफ़ पाते और यह कि इस का ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) ख़ुशनुमा (सुदृश्य) और बातिन गहरा है न इस के अजाइबात मिटने वाले (नाशवान) न इस के लताइफ़ (मृदुलता व स्वच्छता) ख़त्म (समाप्त) होने वाले हैं। जु़मलात (जहालत, अज्ञान) का पर्दा इसी से चाक किया जाता है ।

यह मस्अला (प्रकरण) महल्ले निज़ाअ (विवादग्रस्त) है कि जिस चीज़ पर शरअ (धर्म शास्त्र) की रु से (अनुसार) कोई क़तई दलील क़ाइम (अन्तिम तर्क स्थापित) न हो। आया वाक़े (वास्तव) में उस का कोई हुक्म (निर्णय) होता भी है या नहीं। अबुल हसन अश्अरी और उन के उस्ताद (गुरु) अबू अली जिबाई का मस्लक (मत) यह है कि अल्लाह ने उस के लिये कोई हुक्म (निर्णय) तजवीज़ (प्रस्ताविक) ही नहीं किया बल्कि ऐसे मवारिद (अवसरों) में तश्रीइ व हुक्म (विधान बनाने एंव निर्णय) का इख़तियार (अधिकार) मुज्तहिदीन (धर्म शास्त्रीय विद्धानों) को सौंप दिया है कि वह अपनी सवाबदीद (शुद्ध दृष्टि) से जिसे हराम (वर्जित) ठहरा लें उसे वाक़ई (वास्तव में) हराम (वर्जित) क़रार दे दिया जायेगा। और जिसे हलाल कर दें, उसे वाक़ई हलाल क़रार दिया जायेगा और अगर कोई कुछ कहे और कोई कुछ तो फिर जितनी उन की रायें (मत) होंगीं उतने अह्काम (आदेश) बनते चले जायेंगे और उन में से हर एक का नुक़्तए निगाह (दृष्टिकोण) हुक्मे वाक़ई (वस्तुत: आदेश) का तर्जुमान द्दोतक) होगा। मसलन (उदाहरणार्थ) अगर एक मुजताहिद (धर्मशास्त्रीय विद्धान) की राय यह ठहरी कि नबीज़ (मदिरा, शराब) हराम है और दूसरे मुजतहिद की राय यह हुई कि नबीज़ (मदिरा, शराब) हलाल है तो वह वाक़े (वास्तव में हलाल भी होगी हराम भी) । यअनी (अर्थात्) जो उसे हराम समझे उस के लिये पीना नाजाइज़ है और जो हलाल समझ कर पिये उस के लिये पीना जाइज़ है। चुनांचे शहरिस्तानी इस तस्वीब (मत) के मुतअल्लिक़ तहरीर करते हैं :--

उसूलीयीन का एक गुरोह (रुढ़वादियों का एक वर्ग) इस का क़ाइल है कि जिन मसाइल (प्रकरणों) में इज्तिहाद (धर्म सम्बंधी शोध कार्य) किया जाता है, उन के लिये जवाज़ (औचित्य) व अदमे जवाज़ (अनौचित्य) और हलाल व हराम के एतिबार से (अनुसार) कोई तयशुदा (निशि्चत) हुक्म (आदेश) नहीं होता। बल्कि जो मुजतहिद की राय होती है वही ख़ुदा का हुक्म होता है। क्यों कि हुक्म का क़रार पाना ही इस बात पर मौक़ूफ़ (निर्भर) है कि वह किसी मुजतहिद के नज़रीये (विचारधारा) से तय (निर्णित) हो। अगर यह चीज़ न होगी तो हुक्म भी साबित (सिद्ध) न होगा। और इस मस्लक की बिना पर हर मुज्तहिद अपनी राये में दुरुस्त होगा।

इस सूरत (सि्थति) में मुजतहिद खता (दोष) से इस लिये महफ़ूज़ (सुरक्षित) समझा जाता है कि खता (दोष) तो वहां मुतसव्विर हुआ करती है जहां कोई क़दम वाक़े के खिलाफ़ उठे और जहां कोई वाक़े ही न हो वहां ख़ता के क्या मअनी (अर्थ) । इसके अलावा इस सूरत में भी मुज्तहिद से ख़ता का इम्कान न होगा कि जब यह नज़रीया (विचारधारा) क़ाइम कर लिया जाये कि मुज्तहिदीन की आइन्दा (भविष्य में) जितनी राय होने वाली थीं अल्लाह ने उन से बाखबर (अवगत) होने की बिना पर पहले ही से उतने अह्काम बना रखे हैं कि जिस की वजह से हर राय हुक्म वाक़ई के मुताबिक़ ही पड़ती है। या यह कि उस ने यह इन्तिज़ाम (व्यवस्था) कर रखा है कि बर सबीले इत्तिफ़ाक़ (संयोगवश) उन में से हर एक की राय उन अह्काम में से किसी एक न एक हुक्म से बहर सूरत (प्रत्येक दशा में) मुवाफ़िक़त (सहमति) करेगी।

लेकिन फ़िर्क़ए इमामिया यह है कि अल्लाह ने न किसी को शरीअत साज़ी (शरीअत बनाने) का हक़ दिया है और न किसी चीज़ के हुक्म को मुज्तहिद की राय के ताबे (अधीन) ठहराया है और न आरा (रायों) के मुख़्तलिफ़ (भित्र) होने की सूरत में एक ही चीज़ के लिये वाक़े में मुतअद्दिद (अनेक) अहकामात (आदेश) बनाए हैं। अलबत्ता जब मुज्तहिद की हुक्म वाक़ई (वीस्तविक आदेश) तक रसाई (पहुंच) नहीं हो पाती तो तलाशो तफ़हहुस (खोज का शोध) के बाद जो नज़रीया (विचार धारा) उस का क़रार पाता है उस पर अमल पैरा (कार्यरत) होना उस के लिये और उस के मुक़ल्लिदीन (अनुयाइयों) के लिये किफ़ायत (पर्याप्त) कर जाता है। लेकिन उस की हैसियत सिर्फ हुक्मे ज़ाहिरी की होती है जो हुक्म वाक़ई का बदल है और ऐसी सूरत में हुक्मे वाक़ई के छूट जाने पर वह माज़ूर (विवश) क़रार पा जाता है। क्यों कि उस दरियाए ना पैदा किनार में ग़ोता लगाने और उसकी तह तक पहुंचने में कोई कोशिश प्रयत्न) उठा नहीं रखी। मगर इस पर क्या इख़तियार कि दुरे शाहवार (बड़े मोती) के बजाय ख़ाली सदफ़ (सीप) ही उस के हाथ लगे। लेकिन वह यह नहीं कहता है कि दिखने वाले उसे मोती समझें और मोती के भाव बिके। यह दूसरी बात है कि कोशिशों का परखने वाला उस की भी आधी क़ीमत लगा दे ताकि न उस की मेहनत अकारत जाए और न उस की हिम्मत टूटने पाए।

अगर इस तसवीब (शुद्ध विचार) के उसूल (सिद्धान्त) को मान लिया जाए तो फिर हर फ़त्वे को दुरुस्त और हर क़ौस (कथन) को सहीह मानना पड़ेगा जैसा कि मुबैज़ी ने फ़वातेह में लिखा है :--

हक़ दर इन मस्अला मज़्हबे अश्अरी अस्त पस तवानद बूद कि मज़ाहिबे मुतनाक़िज़ा हमा हक़ बाशन्द ज़िन्हार दर शाने उलमा गुमाने बद मबर व ज़बान बतअने ईशान मकुशा ।

जब मुतज़ाद नज़रीये (परस्पर विरोधी विचार धारायें) और मुखतलिफ़ (विभित्र) फ़त्वे (निर्णय) तक सहीह तस्लीम (स्वीकार) किये जाते हैं तो हैरत (आश्चर्य) है कि बअज़ नुमायां फ़राद के इक़्दामात को खताए इजतिहादी से क्यों तअबीर (अभिप्राय) किया जाता है। जब कि मुज्तहिद के लिये खता (त्रुंटि) का तसव्वुर (कल्पना) ही नहीं हो सकता। अगर अक़ीदए तसवीब (शुद्ध विचारो का विश्वास) सहीह है तो अमीरे शाम (शाम के शासक) और उम्मुल मोमिनीन के इक़दामात (द्वारा उठाए गए क़दम) दुरुस्त मानना पड़ेंगा। और अगर उन के इक़्दामात (कृत कार्यवाहियां) ग़लत समझे जाते हैं तो तसलीम (स्वीकार) कीजिये कि इज्तिहाद ठोकर भी खा सकता है। और तस्वीब का अक़ीदा ग़लत है और यह अपने मक़ाम पर तय होता रहेगा कि उम्मुल मोमिनीन के इज्तिआद में अनूसियत (स्त्रित्व) तो सद्दे राह (बाधक) नहीं होती या अमीरे शामका यह इज्तिहाद था या कुछ और। बहर सूरत (प्रत्येक दशा में) यह तस्वीब का अक़ीदा खताओं (त्रुटियों) के छिपाने और ग़लतियों पर हुक्मे इलाही की नक़ाब डालने के लिये ईजाद (आविष्कार) किया गया था ताकि न मक़सद बर आरियों (उद्देश्य प्राप्तियों) में रोक पैदा हो और न मन मानी कार्यवाहियों के खिलाफ़ कोई ज़बान खोल सके । अमीरुल मोमिनीन ने इस ख़ुत्बे में ऐसे ही लोगों का ज़िक्र किया है जो अल्लाह की राह से कट कर और वहिये इलाही की रौशनी से आंखे बन्द कर के क़ियास व राय (कल्पना एंव अनुमान) के अंधेरों में टाबक टोइयें मारते रहते हैं और दीन (धर्म) को अफ़्कारो आरा (विचारों एंव मतों) की आमाजगाह (केन्द्र) बना कर नित नए फ़त्वे देते रहते है और अपने जी से अह्काम गढ़कर इखतिलाफ़ात (मतभेदों) के शाखसाने (वाद विवाद) छोढ़ते रहते हैं। और फिर तस्वीब की बना पर तमाम मुख्तलिफ़ व मुतज़ाद अह्काम को अल्लाह की तरफ़ से समझ लेते हैं। गोया उन का हर हुक्म वहिये इलाही का तर्जुमान है कि न उन का कोई हुक्म ग़लत हो सकता है और न किसी मोक़े पर वह ठोकर खा सकते हैं। चुनांचे हज़रत इस मस्लक की रद में बयान फ़रमाते है कि :--

(1) जब अल्लाह एक किताब व एक रसूल (स.) एक हैं तो फिर दीन भी एक ही होना चाहिये, और जब दीन एक है तो एक ही चीज़ के लिये मुखतलिफ़ व मुतज़ाद अह्काम क्यों कर हो सकते हैं। क्यों हुक्म में तज़ाद (विरोधाभास) इस सूरत (स्थिति) में हुआ करता है कि जब हुक्म देने वाला पहला हुक्म भूल चुका हो, या उस पर ग़फ़्लत या मदहोशी तारी हो गई हो। या जान बूझ कर उन भूल भुलैयों में चाहता हो, और अल्लाहो रसूल (स.) इन चीज़ो से बलन्द तर हैं। लिहाज़ा इस इखतिलाफ़ को उन की तरफ़ मन्सूब नहीं किया जा सकता। बल्कि यह इखतिलाफ़ात उन लोगों के खयालात व आरा का नतीजा हैं कि जिन्हों ने क़ियास आराइयों से दीन के नुक़ूश को मस्ख करने का तहैया कर लिया था।

(2) अल्लाह ने या तो उन इखतिलाफ़ (मतभेदों) से मनआ किया होगा या इखतिलाफ़ (मतभेद) पैदा करने का हुक्म दिया होगा। अगर हुक्म दिया है तो वह कहां और किस मक़ाम पर है और मुमानिअत (रोकना) सुनना चाहो तो क़ुरआन कहता है :--

इन से कहो क्या अल्लाह ने तुम्हें इजाज़त दे दी है या तुम अल्लाह पर इफ़तिरा (लांछन) करते हो।

यअनी (अर्थात्) हर वह चीज़ जो बहुक्मे खुदा न हो वह इफ़्तिरा (लांछन) है और यह इफ़्तिरा मम्नउ (वर्जित) और हराम (निषिद्ध) है। और इफ़्तिरा पर्दाज़ों (लांछन लगाने वालों) के लिये उक़बा (मृत्योपरान्त जीवन) में न फ़ौजो कामरानी (पद व सफ़लता) है न फ़लाहो बहबूद (हित व भलाई), चुनांचे इर्शाद क़ुद्रत है :--

जो तुम्हारी ज़बानों पर झूटी बातें चढ़ी हुई हैं उन्हें कहा न कहो और न अपनी तरफ़ (ओर) से हुक्म (आदेश) लगाया करो कि यह हलाल है। और यह हराम है कि अल्लाह पर झूट बोह्तान (लांछन) बांधने लगो और जो इफ़्तिरा पर्दाज़ियां करते हैं वह कामयाबी व कामरान से हम किनार न होंगे।

(3) अगर अल्लाह ने दीन (धर्म) को नातमाम (अपूर्ण) रखा है तो उसे अधूरा छोड़ने की यह वजह होगी कि उस ने अपने बन्दों से यह चाहा होगा कि वह शरीअत (धर्म विधान) को पायए तक्मील (पूर्णता) तक पहुंचाने में उस का हाथ बटायें और शरीअत साज़ी (विधायन) में उस के शरीक (सहयोगी) हों तो यह अक़ीदा (विश्वास) सरासर (शिर्क, अनेकेश्वरवाद) है । अगर उस ने दीन को मुकम्मल (पूर्ण) उतारा है तो फिर पैग़म्बर (स.) ने उस के पहुंचाने में कोताही (उदासीनता) की होगी ताकि दूसरों के लिये उस में क़यास व राय (अनुमान एंव विचार) की गुंजाइश रहे तो मआज़ल्लाह (अल्लाह की पनाह) यह पैग़म्बर (स.) की कमज़ोरी औऱ इन्तिखाबे क़ुद्रत (अल्लाह द्वारा चयन) पर बदनुमा धब्बा होगा।

(4) अल्लाह सुब्हानहू ने क़ुरआन में फ़रमाया है कि हम ने किताब में किसी चीज़ को उठा नहीं रखा और हर चीज़ को खोल कर बयान कर दिया है। तो फिर क़ुरआन से हट कर जो हुक्म तराशा जायेगा वह शरीईत से बाहर होगा और उस की असास (अधार) इल्मो बसीरत (ज्ञान एंव चेतना) और क़ुरआनो सुत्रत पर न होगी। बल्कि अपनी ज़ाती राय और अपना ज़ाती फ़ैसला होगा। जिस का दीन व मज़हब से कोई लगाव नहीं समझा जा सकता।

(5) क़ुरआन दीन (धर्म) का मब्ना (मूल आधार) व माखज़ (स्त्रोत) और अह्कामे शरीअत का सरचश्मा (उदगम) है। अगर अह्कामें शरीअत मुख्तलिफ़ (विभित्र) और जुदा जुदा (पृथक-पृथक) होते तो फिर उस में भी इख़तिलाफ़ (मतभेद) होना चाहिये था और उस में इख़तिलाफ़ होता तो यह अल्लाह का कलाम न रहता और जब यह अल्लाह का कलाम है तो फिर शरीअत के अह्काम मुख्तलिफ़ (विभित्र) हो ही नहीं सकते कि तमाम मुख्तलिफ़ (विभित्र) व मुतज़ाद (परस्पर विरोधी) नज़रीयों (विचार धाराओं) को सहीह समझ लिया जाए और क़ियासी फ़त्वों (अनुमान पर आधारित निर्णयों) को उस का हुक्म (आदेश) क़रार दे दिया जाए।

प्रतिक्रियाएँ: 

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  1. इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति....
    sparkindians.blogspot.com

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  3. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

    कृपया अपने ब्लॉग पर से वर्ड वैरिफ़िकेशन हटा देवे इससे टिप्पणी करने में दिक्कत और परेशानी होती है।

    ReplyDelete
  4. लेखन अपने आपमें रचनाधर्मिता का परिचायक है. लिखना जारी रखें, बेशक कोई समर्थन करे या नहीं!

    बिना आलोचना के भी लिखने का मजा नहीं!

    यदि समय हो तो आप निम्न ब्लॉग पर लीक से हटकर एक लेख

    "आपने पुलिस के लिए क्या किया है?"
    पढ़ सकते है.

    http://baasvoice.blogspot.com/
    Thanks.

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